कुदरत  का  कहर  क़यामत  के  आने   की  दस्तक  है  पानी  ही  पानी. इस से भी ख़राब हालात होंगे २०१२ में   ये परिणाम है  कुदरत से खिलबाड़ का........ “Plant Trees to Save Environment” , *खाकी वर्दी वालो के कारनामे-जनता की जुवानी * सफेद कुर्ते वाले नेताओ के कारनामे-जनता की जुवानी "bundelkhandlive.com" पर, आप के पास है कोई जानकारी तो आप भी बन सकते है सिटी रिपोर्टर हमें मेल करे editor@upnewslive.com पर या 09415060119 फ़ोन करे , SPC मीडिया ग्रुप पेश करते है <UPNEWS>मोबाईल sms न्यूज़ एलर्ट के लिए अगर आप भी कहते है अपने और प्रदेश की खबरे अपने मोबाईल पर तो अपना <नाम-, पता-, अपना जॉब,- शहर का नाम, - टाइप कर 09415060119 पर sms, प्रदेश का पहला हिन्दी न्यूज़ पोर्टल जिसमे अपने प्रदेश की खबरें सरकार की योजनाएँ,प्रगति,मंत्रियो के काम की प्रगति www.upnewslive.com पर

Archive | नरेगा

भ्रश्ट ग्राम प्रधान व सचिव ने मनरेगा मेें लाखों डकारे

Posted on 03 August 2010 by admin

उरई (चमारी) कोंच ब्लाक के चमारी गांव में पांच साल वीत चुके हैं एक भी मीटिंग नहीं हुई है जॉब कार्ड पर फर्जी मस्टर रौल बनाकर अपने चहेते लोगों के नाम भरकर फर्जी पैसा निकाला जा रहा है तालाब की वाउन्ड्री वन रही है उसमें वारह एक का मसाले का प्रयोग किया जा रहा है तालाब का मौके पर रकवा भी कम है जो चारों तरफ से लोगों द्वारा दवा लिया गया है बरसात शुरू होते ही गांव मे गन्दगी एवं जलभराव से मच्छरों का साम्राज्य स्थापित हो चला अनेकों संक्रामक बीमारियों ने पांव पसारना आरम्भ कर दिया है गांव का भ्रमण कर संवाददाता ने बरसात के मौसम हेतु प्रशासन द्वारा कराये गये कायोंZ का जायजा लिया तो भ्रश्ठ प्रधान की पोल खुल गई गांव में नालियां नहीं है जिसकेे चलते गन्दगी का साम्राज्य कायम है मच्छरों के काटने से मलेरिया डेंगू आदि जानलेवा बीमारियों का जन्म होता है प्रदेश सरकार द्वारा गांव-गांव में सफाई कर्मियों की नियुक्ति की गई है ऐसी स्थिति में प्रशासन को आलस त्याग कर भ्रश्ठ प्रधान एवं सचिव की लापरवाही के खिलाफ कठोरता से कदम उठाने चाहिये और गांव के लोगों को सुविधायें उपलब्ध करायें गुप्त सूचनाओं द्वारा पता चला है कि प्रधान एवं सचिव पैसे वालों के जॉब कार्ड वनवा रखे हैं उन जॉब काडोंZ में फर्जी मजदूरी दिखाकर पैसे निकाले जा रहे हैं । इसकी जांच शासन द्वारा कराई जाये


Vikas Sharma
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नरेगा के रास्ते अपने पैरों पर खड़े हैं विकलांग साथी

Posted on 21 April 2010 by admin

भूख से मौत और रोजीरोटी के लिए पलायन। ऐसा तब होता है जब लोगों के पास कोई काम नहीं होता। यकीनन गरीबी का यह सबसे भयानक रुप है। इससे निपटने के लिए भारत सरकार के पास ‘‘हर हाथ को काम और काम का पूरा दाम’’ देने वाली ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना’ है। यह योजना लोगों को उनके गांवों में ही काम देने की गांरटी भी देती है। योजना में श्रम पर आधारित कई तरह के कामों का ब्यौरा दिया गया है। इन्हीं में से बहुत सारे कामों से विकलांग साथियों को जोड़ा जा सकता है और उन्हें विकास के रास्ते पर साथ लाया जा सकता है। कैसे, नरेगा का यह तजुर्बा सामने है:
एक आदमी गरीब है, आदिवासी समुदाय से है, और विकलांग है तो उसका हाल आप समझ सकते हैं। उसे उसके हाल से उभारने के लिए आजीविका का कोई मुनासिब जरिया होना जरूरी है। इसलिए दिल्ली में जब गरीबी दूर करने के लिए नरेगा (अब मनरेगा) की बात उठी थी तो मध्यप्रदेश के आदिवासी जिले बड़वानी के ‘आशा ग्राम ट्रस्ट’ ने विकलांग साथियों का ध्यान रखा था और उन्हे रोजगार की गांरटी योजना से जोड़ने की पहल की थी। जहां तय हुआ था कि नरेगा में विकलांग साथियों को उनकी क्षमता और कार्यकुशलता के हिसाब से किस तरह के कामों में और किस तरीके से शामिल जा सकता है।
इसके लिए ब्लाक-स्तर पर एक चरणबद्ध योजना बनायी गई थी। योजना में विकलांग साथियों को न केवल भागीदार बनाया गया था बल्कि उन्हें निर्णायक मंडल में भी रखा गया। उन्होंने एक कार्यशाला के जरिए सबसे पहले वो सूची तैयार की जो बताती थी कि विकलांग साथी कौन-कौन से कामों को कर सकते हैं और कैसे-कैसे। इस सूची में कुल 25 प्रकार के कामों और उनके तरीकों को सुझाया गया था। बाद में सभी 25 प्रकार के कामों को वगीकृत किया गया और सूची को ‘वगीकृत कार्यों वाली सूची’ कहा गया। अब इस सूची की कई फोटोकापियों को ग्राम-स्तर पर संगठित विकलांग साथी समूहों तक पहुंचाया गया। इसके बाद विकलांग साथियों के लिए ‘जाब-कार्ड बनाओ आवेदन करो’ अभियान छेड़ा गया। दूसरी तरफ, इस अभियान में जन-प्रतिनिधियों की सहभागिता बढ़ाने के लिए ‘गांव-गांव की बैठक’ का सिलसिला भी चलाया गया। इसी दौरान विकलांग साथियों ने अपने जैसे कई और साथियों की पहचान करने के लिए एक सर्वे कार्यक्रम भी चलाया था। इससे जहां बड़ी तादाद में विकलांग साथियों की संख्या ज्ञात हो सकी, वहीं उन्हें जाब-कार्ड बनाने और आवेदन भरने के लिए प्रोत्साहित भी किया जा सका। नतीजन, अकेले बड़वानी ब्लाक के 30 गांवों में 100 से ज्यादा विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ा जा सका। तब यहां के विकलांग कार्यकर्ताओं ने कार्य-स्थलों पर घूम घूमके नरेगा की गतिविधियों का मूल्यांकन भी किया था। आज इन्हीं कार्यकर्ताओं द्वारा जिलेभर के हजारों विकलांग साथियों को नरेगा से जोड़ने का काम प्रगति पर है।
रोजगार के लिए विकलांग कार्यकर्ताओं के सामने बाधाएं तो आज भी आती हैं। मगर ऐसी तमाम बाधाओं से पार पाने के लिए इनके पास जो रणनीति है, उसके खास बिन्दु इस तरह से हैं: (1) रोजगार गारंटी योजना के जरिए ज्यादा से ज्यादा विकलांग साथियों को काम दिलाना। (2) पंचायत स्तर पर सरपंच और सचिवों को संवेदनशील बनाना। (3) जन जागरण कार्यक्रमों को बढावा देना। (4) निगरानी तंत्र को त्रि-स्तरीय याने जिला, ब्लाक और पंचायत स्तर पर मजबूत बनाना। (5) लोक-शिकायत की प्रक्रिया को पारदर्शी और त्वरित कार्यवाही के लिए प्रोत्साहित करना। यह तर्जुबा बताता है कि जब एक छोटे से इलाके के विकलांग साथी नरेगा के रास्ते अपने पैरों पर खड़े हो सकते हैं, तो प्रदेश या देश भर के विकलांग साथी भी यही क्रम दोहरा सकते हैं।

शिरीष खरे

शिरीष खरे ‘चाईल्ड राईटस एण्ड यू’ के ‘संचार-विभाग’ से जुड़े हैं। 


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नरेगा: आठ माह में खर्च सिर्फ 2,363.93 करोड़ कैसे होंगे शेष चार महीने में 4966.02 करोड़ खर्च

Posted on 24 November 2009 by admin

लखनऊ -केंद्र सरकार की बहुउपयोगी योजना  नरेगा में इस साल के लिए आवंटित 7,328.95 करोड़ के बजट में से अक्टूबर के अंत तक मात्र 2,362.93 करोड़ ही खर्च हुये हैं जो कुल धनराशि का लगभग 30 प्रतिशत ही है। लगभग पांच हजार करोड़ अवशेष है। गोरतलब है  कि सरकार ने वित्तीय खर्चे का अधिकार ग्राम प्रधानों को दे दिया है। राजाज्ञा भी जारी कर दी है किन्तु इस व्यवस्था के तहत गांवों को एक भी पैसा नहीं गया। पंचायतों को पैसा न पहुंचने से जहां गांवों में मजदूरों को काम देने परेशानी आ रही है वहीं जो काम करा लिया गया है उसके भुगतान में मुश्किल खड़ी हो गई है। प्रधानों के खातों में पैसा न पहुंचने का कारण पूछने पर विभाग ने तकनीकी दिक्कतें बताईं, किन्तु सूत्रों का कहना है अरबों की योजना को कुछ लोग यूं ही हाथ से जाने नहीं देना चाहते। वे नहीं चाहते कि प्रधानों को वित्तीय अधिकार मिले। यही कारण है जिलों से मांगे गये पुराने लेखे-जोखे को उपलब्ध कराने में हीला-हवाली की जा रही है और बिना वित्तीय लेखे के नयी व्यवस्था को लागू करना पैसा आसान नहीं है। चालू वित्तीय वर्ष के शेष चार महीने में 70 प्रतिशत धनराशि कैसे खर्च होगी यह बड़ा सवाल है।

नयी व्यवस्था -नरेगा का पैसा अभी तक इसके समन्वयक जिलाधिकारियों दिया जाता था। वह विकासखंड अधिकारियों के माध्यम से ग्राम पंचायतों या कार्यदायी संस्थाओं को भेजता था। इसमें अनावश्यक देरी होती थी। भारत सरकार के दिशा-निर्देश पर अब यह सीधे राज्य निधि से बैंक टू बैंक ग्राम प्रधानों के खाते में जाएगा। यह दो किस्तों में दिया जाएगा। पहली किस्त 50 प्रतिशत की होगी जिसका 60 प्रतिशत खर्च होने पर दूसरी किस्त दी जाएगी।

vikas sharma

Beuro chief
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ग्राम में 50 जॉबकार्ड धारकों को 100-100 दिन का काम

Posted on 27 October 2009 by admin

उरई- शासन ने सोमवार को वीडियो कांफ्रेंसिंग में जिलाधिकारियों को निर्देश दिए है कि प्रत्येक राजस्व ग्राम में 50 जॉबकार्ड धारकों को 100-100 दिन का काम देने के लिए चिह्नित कर नरेगा श्रमिक बजट तैयार किया जाये।

ग्राम्य विकास विभाग के प्रमुख सचिव श्रीकृष्ण व ग्राम्य विकास आयुक्त ने संयुक्त रूप से वीडियो कांफ्रेंसिंग की। डीएम के किसी जरूरी काम में व्यस्त हो जाने की वजह से यहां मुख्य विकास अधिकारी एसपी अंजोर ने इसमें उनका प्रतिनिधित्व किया। प्रमुख सचिव को उन्होंने बताया कि जिले में 557 आदर्श तालाब बनवाये जा रहे है जिनमें से 59 पूरे हो चुके है। अन्य आदर्श तालाबों का कार्य भी 60 प्रतिशत तक हो चुका है। प्रमुख सचिव ने कहा कि सभी आदर्श तालाब प्राथमिकता के आधार पर पूरा कर उनकी रखवाली के लिए जॉबकार्ड धारकों में से किसी महिला या विकलांग को उनकी चौकीदारी सौंपी जाये। वीडियो कान्फ्रेसिंग में गरीबों के लिए ग्रामीण आवास योजनाओं की लक्ष्य के सापेक्ष प्रगति के बारे में पूछताछ की गयी। सितंबर तक जिले में 621 इंदिरा, महामाया आवास बनवाने का लक्ष्य था। सीडीओ ने बताया कि इसके सापेक्ष 631 आवास पूर्ण कराये गये है। नरेगा के खर्च के बारे में भी प्रमुख सचिव और आयुक्त ने पूछा। सीडीओ ने उन्हे अवगत कराया कि 97 करोड़ रुपए अभी तक मिले थे जिसमें से 59 करोड़ रुपए खर्च हो चुके है। उच्चाधिकारियों ने उनसे कहा कि वे 60 प्रतिशत कार्य पूर्णता के कागजात बनवाकर केंद्र से दूसरी किश्त मांगने के लिए संपर्क करे। प्रमुख सचिव व आयुक्त ने यह भी निर्देश दिए कि आवास योजना की निधि को एकदम पूरी न निकालकर 2-2 महीने की किश्त में निकाला जाये।

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पेरेशान है नरेगा के नाम

Posted on 26 October 2009 by admin

picture_340“लो कल्लो बात! छिरिया (बकरी) मरखू हो गई, नाहकै पेरेशान है नरेगा के नाम पै, ससुरी कउंन सी जरूरत पूरी हो जै सौ दिन मे बाकी दिन में का करो, यह बात बसपा के वरिश्ठ कार्यकर्ता ने दलित आदिवासियों की पंचायत में कही तो लगने लगा कि संवेदनात्मकता को हाशिए पर ढकले कर वोटो की राजनीति में फसल काटने की जुगत कैसे -कैसे लगाई जाती है। कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के पहल पर गरीबों के हर हाथ को काम की कवायद यानी ग्रामों में सौ दिन रोजगार उपलब्ध करा देने वाली योजना के कारण प्रदेश मे लोकसभा चुनाव के बाद दूसरे नम्बर के दल के रूप में ताकत प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की ताकत को कम करने की साजिश के तहत तो नहीं हो रहे नरेगा में घोटाले, यह यक्ष प्रश्न वास्तविक रूप से चितंन मनन के लिए विवश कर रहा है। नरेगा के प्रति सज्ञा शून्य रवैया आखिर क्यो गरीबों के घर में चूल्हा न जलने में ही भलाई है

कवि अग्निवेद के शब्दों में ………..
भविश्य पर अंधकार के बादल छाये
भूख बिलबिलाते बच्चे चिल्लाऐं,
गूंज रहा रूदन चहुं ओर
रात से लेकर सुबह तक शोर
पूरा जंजर उदास
सन्नाटा हर घर के पास
शून्य से शिखर तक सब मौन
इनका दर्द सुनेगा कौन! कौन !!

picture_054भारत के नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में  ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) के क्रियान्वयन में छेद ही छेद नजर आये है।

lko-1031 मार्च 2008 को समाप्त हुए वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना का क्रियान्वयन ही उत्तर प्रदेश में दोशपूर्ण था। गरीब परिवारों को गारंटीशुदा काम नही दिया गया, मजदूरी का फर्जी भुगतान हुआ तथा भुगतान मे अनावश्यक रूप से बिलम्ब किया गया। यही नहीं, योजना के अनुमोदन में ही 6 से 11 महीने का बिलम्ब किया गया। विकास खंड स्तर पर समर्पित कार्यक्रम अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गयी तथा ग्राम पंचायतों मं रोजगार सेवकों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति न होने से योजना का क्रियान्वयन प्रभावित हुआ।

रिपोर्ट के प्रस्तर 3:2 में कहा गया है कि कार्यो का क्रियान्वयन प्राथमिकता सूची के अनुसार नहीं किया गया। ग्रामीण सम्पको का निर्माण प्राथमिकता में सबसे नीचे था उसे उच्चतम वरीयता दी गयी। मस्टर रोल में ऐसे लोगों को मजदूरी का भुगतान किया गया जो ग्रामसभाओं के अस्तित्व में नही थे। यहीं नही भू स्थितियों के अनुरूप जिला अनुसूची की दरें नही तैयार की गयीं। पन्द्रह दिन के भीतर भुगतान क प्रावधान के बावजूद 1.21 करोड़ का भुगतान नौ महीने बाद किया गया। जिला एवं विकास खंड स्तर के अधिकारियों द्वारा अपेक्षित निरीक्षण नहीं किया गया तथा 49 प्रतिशत कामों के अनुश्रवण हेतु समिति का गठन ही नहीं किया गया।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 9 जिलों के 36 विकासखंडों तथा 144 ग्राम पंचायतों का रैंडम लेखा परीक्षण किया गया। प्रमुख सचिव व आयुक्त के साथ परिचयात्मक बैठक की गयी किन्तु परिणाम उत्साहजनक नही निकले। 2006 में इस योजना के तहत काम के बदले अनाज योजना लागू थी किन्तु उसमें 85 करोड़ की धनरािश खर्च ही नही हुई। इसी प्रकार मार्च 2007 में 7.34 करोड़ बच गयें। इससे हमीरपुर, प्रभावित हुए। इस योजना में राज्यांश का केन्द्रांश का 49 करोड़ व राज्यांश का पांच करोड़ खच्र नहीं हुआ।

picture_338वास्तव में देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में गरीबों, मजलूमों की रहनुमा बनने वाली सरकार में गरीबों की योजना तार-तार होती नजर आ रही है। ललितपुर के आसपास हाल बेहाल है ब्लाक के टिकरा जुगराम निवासी जागेश्वर पुत्र लाल पासी ने जुलाई माह में तालाब की खुदाई में 7 दिन कार्य किया लेकिन उसे तीन दिन का भुगतान मिला इसी तरह सुड़िया मउ निवासी भगौती पुत्र नन्हू ने दस दिन कार्य करने पर चार दिन की मजदूरी में सन्तोश करना पड़ा। नरेगा जाब कार्ड पर मनमाफिक हाजरी दर्ज की गयी। मोहन लालगंज विकास खण्ड कुल्हारा निवासी राकेश कुमार के पास जॉब कार्ड तो है लेकिन काम नहीं दिया गया। नरेगा दिवस पर राजधानी में आयी इन शिकायतों के बाद ब्लाक स्तर पर हर दूसरे बुधवार को नरेगा शिविर लगाने की बात कही गयी है। सरकार कहती है कि डुग्गी पिटवाकर गॉव-गॉव में हो रहा नरेगा का प्रचार लेकिन नरेगा दिवस के पहले दिन ही पूरे प्रदेश में कलई खुल गयी। जब शिविर में दो चार लोगों के अलावा लोग नहीं पहुंचे ललितपुर में ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद की मौजदूगी में लगे शिविर में मात्र 40-50 लोगों उपस्थिति ने कलई खोल दी काम कराकर कम मजदूरी देना फर्जी नाम से भुगतान प्राप्त करना। फर्जी हाजिरी दिखाना तथा मजदूरी हड़प जाना तथा जॉब कार्ड के बावजूद काम न देना जैसे मुद्दे सामने आने की बाद केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने धावा बोलकर राज सरकार की नींद उड़ा दी है।एक -एक बीडीओ को तीन -तीन विकास खण्डों का खेवन हार बना दिया गया है। जब उधार के बीडीओ नरेगा की निगरानी करेगे तो परिणाम कैसे होगें। इसका अंजदाज लगाना काफी है। भ्रश्टाचार के नये साधन के रूप में अधिकारियों के लिये नया चारागाह बने नरेगा के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2008-09 में 1779.48 करोड़ का बजट उपलब्ध है।  जिसमें प्रति परिवार 27 दिन का औसत कार्य मिलने का अनुमान लगाया जा सकता है। पूरे प्रदेश में हो रहे कार्यो पर नजर डालने से जो तस्वीर उभरती है वह भयाभय है। सामाजिक कार्यकर्ता डा0 आशीश पटैरिया बताते है कि सख्त निगरानी के बावजूद भी नरेगा प्रशासनिक लापरवाही का भेंट चढ़ गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव का कहना है कि कांग्रेस गरीबों की योजना को भौतिक रूप में क्रियान्वयन करने के लिये टास्क फोर्स के माध्यम से गरीबों के द्वारा तक इस योजना को लेजाने के लिये कटिबद्ध है। नरेगा के प्रति उत्तर प्रदेश में लापरवाही बरते जाने के पीछे राजनैतिक हित साधन माना जा रहा है। कांग्रेस के लिये वारदान साबित हुयी इस परियोजना के लिये उत्तर प्रदेश में किसी भी तरह फेल करने और गड़बड़ियॉ फैलाने में लगा एक वर्ग गरीबों के सपनों को तार-तार हो जाने देना चाहता है। ललितपुर जनपद के डगराना ग्राम में रोजगार सेवक की नियुक्ति ढ़ाई वशZ तक मुख्य विकास अधिकारी की साजिश से रूकी रही। गरीबों का कोई पुरसाल नहीं होने के बाद केन्द्र सरकार ने गरीबों को अजीबों गरीब हालत से निकालकर उनके नसीब में तीन दिन में एक दिन का खाना पक्का करने की गारंटी वाली योजना चलाकर गरीबों के टाट में पेवद लगाने की जो कोिशश की है उसे सचमुच बेहाल करना क्यो नौकरशाही और जनतंत्र की पहली पंचायत ग्रामसभा को मंजूर हो मजबूरी तो नहीं है। यह पढ़कर चौकिये मत यही सच है। कुछ बानगी देखे कानपुर जिले में योजना के तहत सुचारू रूप से काम नहीं हो रहा है। गरीबी के भंवर में फंसे 133293 बेरोजगारों को जॉब कार्ड देना है। किवास विभाग ने 135652 को जॉब कार्ड  दिया गया, लेकिन काम सिर्फ 12768 परिवाों को ही मिल पाया। बरहट गांगर गांव मं तो ग्राम विकास अधिकारी ने कागज मं ही 120 मजदूरों को जॉब कार्ड देदिया और उनके खाते मंधना स्थित सेंट्रल बैंक मे खुलवा दियें। जबकि वास्तव में न उसने एक भी व्यक्ति को जॉब कार्ड दिया था और न ही किसी का खाता खुलवाया था। बुंदेलखंड में इस योजना को परवान चढ़ाने में ग्राम प्रधान ही बाधक है। जॉबकार्ड तो बने, लेकिन मजदूरों के हाथ पहुंचने के बजाय ग्राम प्रधान के घरों में पड़े रहे। साथ ही प्रधान अपने खास लोगों के नाम मस्टररोल में भरकर मजदूरी डकारते रहे। योजना फ्लॉप होने की एक वजह कम मजदूरी भी है आज जब निजी निर्माण में मजदूरी करने पर 120 रूपये प्रतिदिन मिलते हे, वही सरकारी योजना के केवल 100 रूपये मजदूरी का प्रावधान है। जालौन जिले में नरेगा के तहत 124418 परिवारों के जॉबकार्ड बनाये गये है। 31 मार्च 2008 से शुरू वर्तमान वित्तीय वशZ में 31 अगस्त तक प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार 46973 परिवारों ने रोजगार की मांग की जिसमें 46068 परिवारों को रोजगार दिया गया। बुंदेलखण्ड के एक जनपद महोबा में भी नरेगा की रकम प्रधान और पंचायत सचिवों की जागीर बनी हुई है। चालू में जिले को अब तक 35 करोड़ रूपया आवंटित हो चुका है। मार्च तक यह राशि पचास करोड़ पहुंचने का अनुमान है। प्रशासन 62 हजार जॉब कार्ड धारकों में 57 हजार से ज्यादा को रोजगार उपलब्ध करा 16 लाख 85 हजार से ज्यादा मानव दिवस सृजित करने का दावा करता है। चित्रकूट जिले में मजदूरों का समय पर भुगतान न होना आम बात है। यहां नरेगा के तहत चालू वित्तीय वर्ष में शासन द्वारा उपलब्ध कराए गए 3849.91 लाख की धनराशि में 31 अगस्त तक 2131.84 लाख रूपये खर्च तो हुए, लेकिन अभी भी सैकड़ों जॉब कार्ड धारक दो-दो महीने की मजदूरी के लिए भटकते दिखते है।

dcp_0082इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ 66275 लोगों ने ही काम मांगा है जबकि गत वर्ष दो लाख लोगों ने काम मांगा था। योजना के तहत 3242 कार्य प्रस्तावित किये गये लेकिन शुरू हुए सिर्फ 1512 ही। पूरे जनपद में 346163 जॉब कार्ड बने है वही 15 करोड़ रूपया अभी खाते में पड़ा है। फतेहपुर में दो लाख पच्चीस हजार बांटे गये जॉब कार्डो में एक लाख ऐसे लोग है, जो मजदूर ही नहीं है, जबकि पचास हजार से अधिक ऐसे गरीब परिवार जिनकी यहां ऐसे मजदूरों की संख्या पांच सौ भी नहीं पहुंच रही है, जिन्हे साल में सौ दिन का रोजगार मिला हो। 80 प्रतिशत मजदूरों के अभी तक बैंक खाते नही खुले है। कन्नौज में सवा दो करोड़ रूपये से नरेगा की शुरूआत एक अप्रैल को प्रारम्भ हुई, लेकिन जनपद में स्थायी मुख्य विकास अधिकारी की तैनाती न होने की वजह से एक माह तक सिर्फ कागजो और मीटिंगों में ही नरेगा सिमट कर रह गयी। औरैया जिले में योजना लागू होने के पांच माह गुजरने के बाद भी जिले की आधी ग्राम पंचायतों में नरेगा के अंतर्गत काम की शुरूआत नहीं हो सकी। प्रदेश के ग्राम्य विकास मंत्री केन्द्र से 150 दिन की रोजगार गारण्टी की मॉग करते है लेकिन प्रदेश में 25 दिन से अधिक काम नहीं मिल पा रहा है।

कवि कुमार विनोद के शब्दों में
राजधानी को तुम्हारी फिक्र है, यह मान लो
राहते तुम तक अगर पहुँची नहीं तो क्या हुआ।

सुरेन्द्र अग्निहोत्री
राजसदन 120/132 बेलदारी लेन,
लालबाग, लखनऊ

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क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोका जा सकता है

Posted on 24 October 2009 by admin

महोबा-जिला पंचायत परिसर में पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि के अंतर्गत ग्राम पंचायत अध्यक्ष एवं ग्राम पंचायत समितियों के तीन दिवसीय प्रशिक्षण के अंतिम दिन जिला समाज कल्याण अधिकारी उमापति ने कहा कि शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले असहाय, विकलांग व गरीब लोगों को समाज कल्याण विभाग आर्थिक सहायता प्रदान करता है। जिससे इन असहायों की आर्थिक स्थिति को मजबूत किया जा सके।

समाज कल्याण अधिकारी ने कहा कि शासन स्तर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीबों, वृद्धों, असहायों, विधवाओं के कल्याण के लिए विभिन्न योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिससे उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत किया जा सके। जल निगम के अधिशासी अभियंता कुलदीप हरि ने कहा कि प्रधान, ग्राम पंचायत व क्षेत्र पंचायत सदस्य ग्रामीणों को जल संचयन व हैंडपंप के उचित तरीके से प्रयोग और इनकी सुरक्षा के लिए उन्हें जागरूक करें। जिससे इन्हें अधिक समय तक सुरक्षित रखा जा सके। जिला पंचायत के अपर मुख्य अधिकारी के.एन खरवार ने चरखारी व जैतपुर विकास खंड के ग्राम प्रधानों, क्षेत्र व गांव पंचायत सदस्यों का आह्वान करते हुए कहा कि वह प्रशिक्षण में ग्रामीण क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। हिमांशु कुमार ने कहा ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के बिना समाज की स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता। मुख्य विकास अधिकारी जयराम लाल वर्मा ने समापन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि नरेगा व स्वर्ण जयंती रोजगार योजना का क्रियान्वयन नियमानुसार करने से क्षेत्रों से होने वाले पलायन को रोका जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान सभी क्षेत्र व ग्राम पंचायत सदस्य, प्रधान मौजूद रहे।

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नरेगा निगरानी दिवस माह के दूसरे बुधवार को

Posted on 11 October 2009 by admin

हमीरपुर-मुख्य विकास अधिकारी भारत यादव ने जानकारी दी कि तहसील स्तरीय नरेगा निगरानी दिवस अब महीने के पहले बुधवार की जगह प्रत्येक माह के दूसरे बुधवार को होगा। जिसके तहत अब नरेगा दिवस 14 अक्टूबर, 11 नवंबर, 9 दिसंबर, 13 जनवरी, 10 फरवरी और 10 मार्च को होगा।

उन्होंने बताया कि शासन के संज्ञान में आया कि प्रत्येक माह के प्रथम मंगलवार को तहसील दिवस का आयोजन किया जाता है। इसलिए माह के प्रथम बुधवार को नरेगा दिवस के दिन जनता भाग नहीं ले पाती। इसलिए शासन को यह निर्णय लेना पड़ा कि अब प्रत्येक माह के दूसरे बुधवार को नरेगा दिवस आयोजित किया जायेगा।

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नरेगा - काम की नहीं भ्रष्टाचार की गारण्टी

Posted on 11 October 2009 by admin

उरई- नरेगा की स्थिति को लेकर समूचे जिले में बहस हो रही है। नित नये कारनामे सामने आ रहे है। इन तथ्यों के बीच एक तथ्य यह भी सामने आ रहा है कि पंचायत पदाधिकारी अपनी खेती कराने के अलावा विद्यालयों, सीसी रोड आदि निर्माण कार्यो में भी नरेगा के मजदूरों को लगा देते हैं। बाद में सुरक्षित रखे गए जॉब कार्डो में मनमानी प्रविष्टिया दर्ज कर दी जातीं। इस तरह की स्थिति ऐसी ग्राम पंचायतों में प्रमुख रूप से गाहे बगाहे सामने आयी, जहा के पंचायत पदाधिकारी व उनके परिजन निर्माण कार्य में सीधे तौर पर शामिल रहे। नरेगा के साथ हुए खिलवाड़ की जाच कराये गये कार्यो की निगरानी से आसानी से सामने आ सकती है। विभिन्न संगठनों ने अप्रत्यक्ष रूप से ठेकेदारी से ताल्लुक रखने वाले पंचायत पदाधिकारियों की कार्य प्रणाली पर जाच की माग उठायी है। वन विभाग के वृक्षारोपण कार्य की शिकायतों का सिलसिला अभी भी बना हुआ है। इसके साथ-साथ पुरानी बन्धियों को नयी बता देने, पुराने मार्गो को नया निर्मित बता देने, पुराने कुओं को नया निर्मित बताकर धनराशि को खुर्दबुर्द कर देने के मामले समय-समय पर सुर्खिया बनते रहे। ऐसी स्थिति में कुछ संगठनों ने यह भी शिकायतें की है कि ऐसी ग्राम पंचायतें जहा के पंचायत पदाधिकारी निर्माण कार्य कराते है, उनका तो दबदबा यहा तक रहता है कि गाव में होने वाला कोई भी पक्का निर्माण कार्य वही करेगे। ऐसे कार्यो में नरेगा के मजदूर खेपने के तथ्य बताये गये है। यदि यह शिकायत सही है तो यह काफी गम्भीर हो सकती है। संगठनों का यह भी कहना है कि कई पंचायत पदाधिकारी कृषि से भी जुड़े हुए है। उनके खेतों में काम करने वाले मजदूर भी नरेगा के इस्तेमाल किये जाते है। नरेगा के मजदूर पंचायत पदाधिकारियों की फसल की बुवाई, निराई, कटाई आदि में योगदान देते है। इस सम्बन्ध में बुन्देलखण्ड मजदूर मोर्चा ने भी मजदूरों के गोपनीय बयान लेकर सम्बन्धित लोगों के खिलाफ कार्यवाही की माग उठायी है। संगठन का तो यहा तक कहना है कि दबंग पदाधिकारी मजदूरों से गालीगलौज भी करते है। इसके अलावा निर्धारित समय से अधिक काम लिया जाता है। कई योजनाओं में तो ऐसे मजदूरों का इस्तेमाल कर लिया गया, जिनमें रचमात्र भी धनराशि नहीं दी गयी। किसी को भूमि का पट्टा देने का लालच दिया गया तो किसी को इदिरा आवास बना देने का आश्वासन।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारटी योजना में पारदर्शिता बरतने के लिए बैंकों में खाता खोलने के निर्देश दिये गये थे। इसके बावजूद भी लाभार्थी योजना का धन प्राप्त नहीं कर पा रहे है। डाकघरों से मिलने वाली धनराशि में तो मजदूरों को टरकाया जा रहा है। बाद में धनराशि की गोपनीय ढग से निकासी कर ली जाती। चालाक लोग मजदूरों की पासबुकें अपने पास रखते है। मजदूर कहते है कि पैसा आ गया कि नहीं तो वह कहते कि अभी पैसा आया नहीं है, जबकि हकीकत कुछ और ही है। केन्द्रीय जाच दल ने जिले में नरेगा की खराब स्थिति पायी थी। जिन-जिन इलाकों में इस दल ने बारीकी से मूल्याकन किया था वहा पर भ्रष्टाचार के मामले सामने आये थे। ऐसी स्थिति में नरेगा के मजदूरों को खेती किसानी, सड़क निर्माण कार्यो, विद्यालय निर्माण आदि में लगाने वाले पंचायत पदाधिकारियों की निगरानी कराये जाने की माग विभिन्न संगठनों ने उठाना शुरू कर दी है। इसके साथ-साथ मजदूरों द्वारा कराये गये कार्यो का बारीकी से अध्ययन किये जाने की भी आवश्यकता महसूस की जा रही है।

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