“लो कल्लो बात! छिरिया (बकरी) मरखू हो गई, नाहकै पेरेशान है नरेगा के नाम पै, ससुरी कउंन सी जरूरत पूरी हो जै सौ दिन मे बाकी दिन में का करो, यह बात बसपा के वरिश्ठ कार्यकर्ता ने दलित आदिवासियों की पंचायत में कही तो लगने लगा कि संवेदनात्मकता को हाशिए पर ढकले कर वोटो की राजनीति में फसल काटने की जुगत कैसे -कैसे लगाई जाती है। कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व के पहल पर गरीबों के हर हाथ को काम की कवायद यानी ग्रामों में सौ दिन रोजगार उपलब्ध करा देने वाली योजना के कारण प्रदेश मे लोकसभा चुनाव के बाद दूसरे नम्बर के दल के रूप में ताकत प्राप्त करने के बाद कांग्रेस की ताकत को कम करने की साजिश के तहत तो नहीं हो रहे नरेगा में घोटाले, यह यक्ष प्रश्न वास्तविक रूप से चितंन मनन के लिए विवश कर रहा है। नरेगा के प्रति सज्ञा शून्य रवैया आखिर क्यो गरीबों के घर में चूल्हा न जलने में ही भलाई है
कवि अग्निवेद के शब्दों में ………..
भविश्य पर अंधकार के बादल छाये
भूख बिलबिलाते बच्चे चिल्लाऐं,
गूंज रहा रूदन चहुं ओर
रात से लेकर सुबह तक शोर
पूरा जंजर उदास
सन्नाटा हर घर के पास
शून्य से शिखर तक सब मौन
इनका दर्द सुनेगा कौन! कौन !!
भारत के नियंत्रक एवं महा लेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (नरेगा) के क्रियान्वयन में छेद ही छेद नजर आये है।
31 मार्च 2008 को समाप्त हुए वर्ष की रिपोर्ट में कहा गया है कि योजना का क्रियान्वयन ही उत्तर प्रदेश में दोशपूर्ण था। गरीब परिवारों को गारंटीशुदा काम नही दिया गया, मजदूरी का फर्जी भुगतान हुआ तथा भुगतान मे अनावश्यक रूप से बिलम्ब किया गया। यही नहीं, योजना के अनुमोदन में ही 6 से 11 महीने का बिलम्ब किया गया। विकास खंड स्तर पर समर्पित कार्यक्रम अधिकारी की नियुक्ति नहीं की गयी तथा ग्राम पंचायतों मं रोजगार सेवकों की पर्याप्त संख्या में नियुक्ति न होने से योजना का क्रियान्वयन प्रभावित हुआ।
रिपोर्ट के प्रस्तर 3:2 में कहा गया है कि कार्यो का क्रियान्वयन प्राथमिकता सूची के अनुसार नहीं किया गया। ग्रामीण सम्पको का निर्माण प्राथमिकता में सबसे नीचे था उसे उच्चतम वरीयता दी गयी। मस्टर रोल में ऐसे लोगों को मजदूरी का भुगतान किया गया जो ग्रामसभाओं के अस्तित्व में नही थे। यहीं नही भू स्थितियों के अनुरूप जिला अनुसूची की दरें नही तैयार की गयीं। पन्द्रह दिन के भीतर भुगतान क प्रावधान के बावजूद 1.21 करोड़ का भुगतान नौ महीने बाद किया गया। जिला एवं विकास खंड स्तर के अधिकारियों द्वारा अपेक्षित निरीक्षण नहीं किया गया तथा 49 प्रतिशत कामों के अनुश्रवण हेतु समिति का गठन ही नहीं किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 9 जिलों के 36 विकासखंडों तथा 144 ग्राम पंचायतों का रैंडम लेखा परीक्षण किया गया। प्रमुख सचिव व आयुक्त के साथ परिचयात्मक बैठक की गयी किन्तु परिणाम उत्साहजनक नही निकले। 2006 में इस योजना के तहत काम के बदले अनाज योजना लागू थी किन्तु उसमें 85 करोड़ की धनरािश खर्च ही नही हुई। इसी प्रकार मार्च 2007 में 7.34 करोड़ बच गयें। इससे हमीरपुर, प्रभावित हुए। इस योजना में राज्यांश का केन्द्रांश का 49 करोड़ व राज्यांश का पांच करोड़ खच्र नहीं हुआ।
वास्तव में देखा जाये तो उत्तर प्रदेश में गरीबों, मजलूमों की रहनुमा बनने वाली सरकार में गरीबों की योजना तार-तार होती नजर आ रही है। ललितपुर के आसपास हाल बेहाल है ब्लाक के टिकरा जुगराम निवासी जागेश्वर पुत्र लाल पासी ने जुलाई माह में तालाब की खुदाई में 7 दिन कार्य किया लेकिन उसे तीन दिन का भुगतान मिला इसी तरह सुड़िया मउ निवासी भगौती पुत्र नन्हू ने दस दिन कार्य करने पर चार दिन की मजदूरी में सन्तोश करना पड़ा। नरेगा जाब कार्ड पर मनमाफिक हाजरी दर्ज की गयी। मोहन लालगंज विकास खण्ड कुल्हारा निवासी राकेश कुमार के पास जॉब कार्ड तो है लेकिन काम नहीं दिया गया। नरेगा दिवस पर राजधानी में आयी इन शिकायतों के बाद ब्लाक स्तर पर हर दूसरे बुधवार को नरेगा शिविर लगाने की बात कही गयी है। सरकार कहती है कि डुग्गी पिटवाकर गॉव-गॉव में हो रहा नरेगा का प्रचार लेकिन नरेगा दिवस के पहले दिन ही पूरे प्रदेश में कलई खुल गयी। जब शिविर में दो चार लोगों के अलावा लोग नहीं पहुंचे ललितपुर में ग्रामीण विकास मंत्री दद्दू प्रसाद की मौजदूगी में लगे शिविर में मात्र 40-50 लोगों उपस्थिति ने कलई खोल दी काम कराकर कम मजदूरी देना फर्जी नाम से भुगतान प्राप्त करना। फर्जी हाजिरी दिखाना तथा मजदूरी हड़प जाना तथा जॉब कार्ड के बावजूद काम न देना जैसे मुद्दे सामने आने की बाद केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्य मंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने धावा बोलकर राज सरकार की नींद उड़ा दी है।एक -एक बीडीओ को तीन -तीन विकास खण्डों का खेवन हार बना दिया गया है। जब उधार के बीडीओ नरेगा की निगरानी करेगे तो परिणाम कैसे होगें। इसका अंजदाज लगाना काफी है। भ्रश्टाचार के नये साधन के रूप में अधिकारियों के लिये नया चारागाह बने नरेगा के अन्तर्गत वित्तीय वर्ष 2008-09 में 1779.48 करोड़ का बजट उपलब्ध है। जिसमें प्रति परिवार 27 दिन का औसत कार्य मिलने का अनुमान लगाया जा सकता है। पूरे प्रदेश में हो रहे कार्यो पर नजर डालने से जो तस्वीर उभरती है वह भयाभय है। सामाजिक कार्यकर्ता डा0 आशीश पटैरिया बताते है कि सख्त निगरानी के बावजूद भी नरेगा प्रशासनिक लापरवाही का भेंट चढ़ गया है। कांग्रेस के प्रवक्ता सुबोध श्रीवास्तव का कहना है कि कांग्रेस गरीबों की योजना को भौतिक रूप में क्रियान्वयन करने के लिये टास्क फोर्स के माध्यम से गरीबों के द्वारा तक इस योजना को लेजाने के लिये कटिबद्ध है। नरेगा के प्रति उत्तर प्रदेश में लापरवाही बरते जाने के पीछे राजनैतिक हित साधन माना जा रहा है। कांग्रेस के लिये वारदान साबित हुयी इस परियोजना के लिये उत्तर प्रदेश में किसी भी तरह फेल करने और गड़बड़ियॉ फैलाने में लगा एक वर्ग गरीबों के सपनों को तार-तार हो जाने देना चाहता है। ललितपुर जनपद के डगराना ग्राम में रोजगार सेवक की नियुक्ति ढ़ाई वशZ तक मुख्य विकास अधिकारी की साजिश से रूकी रही। गरीबों का कोई पुरसाल नहीं होने के बाद केन्द्र सरकार ने गरीबों को अजीबों गरीब हालत से निकालकर उनके नसीब में तीन दिन में एक दिन का खाना पक्का करने की गारंटी वाली योजना चलाकर गरीबों के टाट में पेवद लगाने की जो कोिशश की है उसे सचमुच बेहाल करना क्यो नौकरशाही और जनतंत्र की पहली पंचायत ग्रामसभा को मंजूर हो मजबूरी तो नहीं है। यह पढ़कर चौकिये मत यही सच है। कुछ बानगी देखे कानपुर जिले में योजना के तहत सुचारू रूप से काम नहीं हो रहा है। गरीबी के भंवर में फंसे 133293 बेरोजगारों को जॉब कार्ड देना है। किवास विभाग ने 135652 को जॉब कार्ड दिया गया, लेकिन काम सिर्फ 12768 परिवाों को ही मिल पाया। बरहट गांगर गांव मं तो ग्राम विकास अधिकारी ने कागज मं ही 120 मजदूरों को जॉब कार्ड देदिया और उनके खाते मंधना स्थित सेंट्रल बैंक मे खुलवा दियें। जबकि वास्तव में न उसने एक भी व्यक्ति को जॉब कार्ड दिया था और न ही किसी का खाता खुलवाया था। बुंदेलखंड में इस योजना को परवान चढ़ाने में ग्राम प्रधान ही बाधक है। जॉबकार्ड तो बने, लेकिन मजदूरों के हाथ पहुंचने के बजाय ग्राम प्रधान के घरों में पड़े रहे। साथ ही प्रधान अपने खास लोगों के नाम मस्टररोल में भरकर मजदूरी डकारते रहे। योजना फ्लॉप होने की एक वजह कम मजदूरी भी है आज जब निजी निर्माण में मजदूरी करने पर 120 रूपये प्रतिदिन मिलते हे, वही सरकारी योजना के केवल 100 रूपये मजदूरी का प्रावधान है। जालौन जिले में नरेगा के तहत 124418 परिवारों के जॉबकार्ड बनाये गये है। 31 मार्च 2008 से शुरू वर्तमान वित्तीय वशZ में 31 अगस्त तक प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार 46973 परिवारों ने रोजगार की मांग की जिसमें 46068 परिवारों को रोजगार दिया गया। बुंदेलखण्ड के एक जनपद महोबा में भी नरेगा की रकम प्रधान और पंचायत सचिवों की जागीर बनी हुई है। चालू में जिले को अब तक 35 करोड़ रूपया आवंटित हो चुका है। मार्च तक यह राशि पचास करोड़ पहुंचने का अनुमान है। प्रशासन 62 हजार जॉब कार्ड धारकों में 57 हजार से ज्यादा को रोजगार उपलब्ध करा 16 लाख 85 हजार से ज्यादा मानव दिवस सृजित करने का दावा करता है। चित्रकूट जिले में मजदूरों का समय पर भुगतान न होना आम बात है। यहां नरेगा के तहत चालू वित्तीय वर्ष में शासन द्वारा उपलब्ध कराए गए 3849.91 लाख की धनराशि में 31 अगस्त तक 2131.84 लाख रूपये खर्च तो हुए, लेकिन अभी भी सैकड़ों जॉब कार्ड धारक दो-दो महीने की मजदूरी के लिए भटकते दिखते है।
इस वित्तीय वर्ष में सिर्फ 66275 लोगों ने ही काम मांगा है जबकि गत वर्ष दो लाख लोगों ने काम मांगा था। योजना के तहत 3242 कार्य प्रस्तावित किये गये लेकिन शुरू हुए सिर्फ 1512 ही। पूरे जनपद में 346163 जॉब कार्ड बने है वही 15 करोड़ रूपया अभी खाते में पड़ा है। फतेहपुर में दो लाख पच्चीस हजार बांटे गये जॉब कार्डो में एक लाख ऐसे लोग है, जो मजदूर ही नहीं है, जबकि पचास हजार से अधिक ऐसे गरीब परिवार जिनकी यहां ऐसे मजदूरों की संख्या पांच सौ भी नहीं पहुंच रही है, जिन्हे साल में सौ दिन का रोजगार मिला हो। 80 प्रतिशत मजदूरों के अभी तक बैंक खाते नही खुले है। कन्नौज में सवा दो करोड़ रूपये से नरेगा की शुरूआत एक अप्रैल को प्रारम्भ हुई, लेकिन जनपद में स्थायी मुख्य विकास अधिकारी की तैनाती न होने की वजह से एक माह तक सिर्फ कागजो और मीटिंगों में ही नरेगा सिमट कर रह गयी। औरैया जिले में योजना लागू होने के पांच माह गुजरने के बाद भी जिले की आधी ग्राम पंचायतों में नरेगा के अंतर्गत काम की शुरूआत नहीं हो सकी। प्रदेश के ग्राम्य विकास मंत्री केन्द्र से 150 दिन की रोजगार गारण्टी की मॉग करते है लेकिन प्रदेश में 25 दिन से अधिक काम नहीं मिल पा रहा है।
कवि कुमार विनोद के शब्दों में
राजधानी को तुम्हारी फिक्र है, यह मान लो
राहते तुम तक अगर पहुँची नहीं तो क्या हुआ।
सुरेन्द्र अग्निहोत्री
राजसदन 120/132 बेलदारी लेन,
लालबाग, लखनऊ
