Posted on 24 June 2010 by admin
साउथ अफ्रीका की डॉक्टर सॉनेट एहलर्स ने ऐसा फीमेल कॉन्डोम डेवलप किया है जिसके इस्तेमाल से बलात्कार जैसे घिनौने अपराधों पर रोक लग सकती है। बलात्कार की कोशिश करने वाले पुरुष को अपनी इस हरकत की सजा मिलेगी। बलात्कार की कोशिश करने के बाद उसे दिन में तारे नज़र आने लगेंगे और उसके गुप्तांग में बेहद तेज दर्द होगा। पुरूष को ज़माने भर की जग-हसांई मिलेगी सो अलग से।
‘रेप एक्स’ (यानि बलात्कार पर कुल्हाड़ी) नाम के इस कॉन्डम की खासियत यह है कि इसमें कांटों की एक कतार जैसी लगी होती है। अगर कोई पुरुष बलात्कार करने की करता है और महिला की योनि में अपना गुप्तांग प्रविष्ट करवाता है तो इस अनोखे कॉन्डोम पर लगे दांतों जैसे कांटे उसके पेनिस को जकड़ लेते हैं। पुरूष अपने पेनिस को निकालने की जितनी ज्यादा कोशिश करेगा, इन कांटों की पेनिस पर पकड़ और भी ज्यादा गहरी होती जाएगी। बलात्कारी पुरूष ना तो टॉयलेट जा सकेगा और न ही चल-फिर पाएगा।
ये चमत्कारी कॉन्डोम ‘रेप एक्स’ सिर्फ डॉक्टर की मदद से ही निकलवाया जा सकेगा। डॉक्टर एहलर्स ने बताया कि चूंकि ये कांटे घाव नहीं बनाते इसलिए पीड़ित महिला को हमलावर के शरीर से निकलने वाले किसी भी प्रकार के द्रव के संपर्क में आने का खतरा नहीं रहता है।
इस कॉन्डम को 20 बरसों के रिसर्च के बाद बनाया गया है। फिलहाल ये ट्रायल पीरियड में है लेकिन जल्द ही यह लगभग 100 रुपये में मिलने लगेगा। यह उन महिलाओं के लिए फायदेमंद होगा जिन्हें जोखिम भरी जगहों पर जाना हो।
Posted on 01 February 2010 by admin
उम्र के ज्यादा हो जाने पर महिलाओं को गर्भधारण करने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वैज्ञानिकों ने यह गुत्थी भी सुलझा ली है। हाल के एक शोध में कहा गया है कि 30 साल तक पहुंचते-पहुंचते महिलाओं में उर्वर अण्डाणुओं के भण्डार में 90 फीसदी तक कमी हो जाती है। यही कारण है कि तीस पार की महिलाओं को गर्भधारण में दिक्कत आती है।
शोध के मुताबिक “हालांकि महिलाओं में अण्डाणुओं का बनना जीवन के तीसरे और चौथे दशक में भी जारी रहता हैए लेकिन उर्वर अण्डाणुओं के संचय में खासी गिरावट आ जाती है। महिलाओं का शरीर सर्वश्रेष्ठ अण्डाणुओं को अपने भण्डार के लिए चुनता है। उम्र बढ़ने के साथ अण्डाणुओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है जिससे गर्भधारण में समस्या के साथ कमजोर बच्चा पैदा होने का खतरा बढ़ जाता है।”
सेंट एण्ड्रयूज और एडिनबरा यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने महिलाओं के अण्डाणु संचय में कमी होने के लिए कई प्रयोग किए। इसके लिए उन्होंने गर्भाधान से लेकर रजोनिवृत्ति तक बनने वाले उर्वर अण्डाणुओं का अध्ययन किया। इसके मुताबिक औसतन महिलाएं 3 लाख उर्वर अण्डाणु पैदा करती हैंए लेकिन उनका अण्डाणुओं का संचय उम्र बढ़ने के साथ तेजी से कम होने लगता है। 30 की उम्र तक पहुंचते.पहुंचते महिलाओं में अण्डाणुओं का यह भण्डार 12 फीसदी बाकी रहता है और 40 तक महज तीन फीसदी।
शोधकर्ता डा. हैमिश वालेस का कहना है, “हमारे अध्ययन के मुताबिक 30 साल तक जाते.जाते 95 फीसदी महिलाओं में 12 फीसदी अण्डाणु संचय रह जाता है और 40 साल की उम्र तक केवल 3 फीसदी। बढ़ती उम्र में भी अधिकांश महिलाएं यही सोचती हैं कि उनमें अण्डाणुओं का निर्माण हो रहा है और वे गर्भधारण कर सकती हैं। यही समस्या की वजह है।”
vikas kumar sharma
Ph-09415060119
Posted on 21 January 2010 by admin
मानिकपुर- अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती महिला की हालत गम्भीर बताते हुए चिकित्सकों द्वारा रिफर कर दिया गया। जिसके बाद परिजन उसे किसी शहर ले जाने के लिए मानिकपुर जंक्शन स्टेशन पहुंचे। रेलवे स्टेशन परिसर में ही महिला ने प्रसव वेदना तेज होने के साथ बच्चे को जन्म दे दिया ।
प्राप्त जानकारी के अनुसार विकासखण्ड मानिकपुर अन्तर्गत डाण्डी निवासी संपत ने अपनी पत्नी कलावती 24 को प्रसव के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में गुरुवार की तड़के भर्ती कराया था। लेकिन भर्ती करने के बाद डाक्टरों ने उसकी हालत जानने की कोशिश नहीं की। बार-बार प्रसव पीड़ा उठने पर जब उसके परिवारी जनों ने डाक्टरों से इलाज करने की बात कही तो डाक्टरों ने हालत गम्भीर बताते हुए महिला को कहीं बाहर ले जाने के लिए कहते हुए बाहर कर दिया। पीड़ित महिला के पति संपत ने बताया कि किसी बड़े शहर ले जाने के लिए वह परिवार के अन्य सदस्यों के साथ पत्नी को मानिकपुर जंक्शन रेलवे स्टेशन लाया। गाड़ी का इन्तजार करते हुए देर हो गई और उसकी पत्नी प्रसव वेदना से तड़पने लगी। जिसके कुछ ही समय बाद उसकी पत्नी ने एक बच्चे को जन्म दिया। उसने डाक्टरों पर लापरवाही का आरोप लगाते हुए कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है। वहीं इस सम्बंध मे जब चिकित्साधीक्षक डा. विनय कुमार से बात की गई तो उन्होंने कहा कि महिला की स्थित नाजुक होने पर अस्पताल से रिफर किया गया था। अस्पताल में फैली चिकित्सीय अव्यवस्थाओं पर बात करने से वह कतराने लगे।
पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे कई मामले
केन्द्र व प्रदेश सरकार द्वारा जच्चा एवं बच्चा की सुरक्षा के लिए चाहे कितनी ही योजनाएं चलाई जाएं। लेकिन सम्बंधित लोगों की लापरवाही के चलते इसका लाभ सभी का नहीं मिल पाता। कई बार इस तरह की घटनाएं सामने आने के बाद भी अधिकारियों द्वारा जांच के नाम चुप्पी साध ली जाती है और कार्रवाई न होने से सम्बंधित लोगों की लापरवाही पर अंकुश भी नहीं लग पाता। सरकारी अस्पतालों में ही प्रसव कराने के लिए सरकार द्वारा ग्रामीणों को प्रोत्साहित करते हुए आर्थिक लाभ भी दिया जाता है। लेकिन जब ग्रामीण सरकारी अस्पतालों में पहुंचते हैं तो वहां तैनात चिकित्सक पहले तो मरीज को भर्ती ही नहीं करते या फिर भर्ती करते हैं तो ठीक से उसकी देखभाल नहीं होती। इसी का नमूना गुरुवार को भी देखने को मिला मानिकपुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य में प्रसव के लिए आई कलावती को भर्ती करने के कुछ देर बाद डाक्टरों ने बिना देखे ही अन्य जगह ले जाने की बात कहते हुए अस्पताल से बाहर कर दिया। जिस पर रेलवे स्टेशन परिसर में महिला द्वारा बच्चे को जन्म दिया। लोगों का कहना है कि सम्बंधित अधिकारियों द्वारा जांच के नाम पर शिकायतें दबा दी जाती हैं। कोई कार्रवाई न होने के कारण यहां तैनात लोगों की लापरवाही पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। यदि किसी एक पर कड़ी कार्रवाई हो जाए तो दुबारा ऐसी घटनाएं न घटित होंगी।
श्री गोपाल
09839075109
Posted on 14 January 2010 by admin
ललितपुर-जिलाधिकारी रणवीर प्रसाद ने संयुक्त जिला चिकित्सालय की व्यवस्थाओं को देखने के लिए बुधवार करीब 11.30 बजे पूरे लाव लश्कर के साथ जिला अस्पताल में छापा मारा, जिससे जिला अस्पताल में हड़कम्प मच गया था।। इस दौरान महिला अस्पताल के प्रसव वार्ड व एसएनसीयू में गंदगी देखकर भड़क गये। इस दौरान मरीजों ने जिलाधिकारी से स्टाफ की शिकायतें कीं।
शासन की मंशानुसार लोगों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं प्राप्त हो रही है या नहीं। इस हकीकत को परखने के लिए बुधवार करी 11.30 बजे बजे जिलाधिकारी ने लाव लश्कर के साथ संयुक्त जिला चिकित्सालय में छापा मारा। अचानक डीएम साहब के जिला अस्पताल पहुंचने से वहा हड़कम्प मच गया। सर्वप्रथम जिलाधिकारी ने महिला अस्पताल के प्रसव वार्ड का मुआयना किया। यहा पलंग विस्तरों के गद्दे व चादर गंदे देख तथा आसपास कूड़ा करकट देखकर भड़क गये और मौजूद स्टाफ को कड़ी फटकार लगायी, जिससे कर्मियों को इस कड़ाके की सर्दी में भी पसीने छूट गए। यहा जिलाधिकारी ने मरीजों से भी उनका हालचाल पूछा। इस पर उन्होंने मौजूदा स्टाफ की कई शिकायतें उनसे कीं। इस पर एक बार फिर उनकी त्यौरिया चढ़ गयीं। यहा से उन्होंने एसएनसीयू वार्ड की ओर रुख किया। यहा व्याप्त गंदगी देखकर उन्होंने तत्काल सफाई कराने के निर्देश दिए। इसके बाद उन्होंने पुरुष वार्ड की ओर अपना रुख किया। जहा एक मरीज ने डाक्टर द्वारा बाहर की दवाई लिखे होने की बात उन्हे बतायी। इस पर उन्होंने मौके पर ही मामले की जाच की तो बताया गया कि उक्त मरीज अस्पताल से डिस्चार्ज हो चुका है तथा उसी के द्वारा ज्यादा जोर देने पर ही उक्त डाक्टर ने अस्पताल के बाहर की दवा लिखी थी। मुख्य चिकित्सा अधीक्षक के निर्देश पर अस्पताल से डिस्चार्ज होने वाले मरीज को 5 दिन की दवा अस्पताल से ही दी जाती है। इसके अलावा उन्होंने चिकित्सकों को किसी भी मरीज को बाहर की दवा न लिखने की सख्त हिदायत भी दे रखी है। इसके बाद जिलाधिकारीने महिला वार्ड का भी निरीक्षण कर मरीजों की समस्याएं सुनीं। इस मौके पर उन्होंने जिला अस्पताल की चाक चौबंद सफाई व्यवस्था की प्रशसा करते हुए व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने के निर्देश सीएमएस को दिए।
इस मौके पर उप जिलाधिकारी पी.के.श्रीवास्तव, तहसीलदार सालिगराम पटेल, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डा.के.लाल, डा.एम.सी.गुप्ता, डा.राजेश त्रिपाठी, डा.पंकज त्रिपाठी, डा.जी.के.अग्रवाल, डा.कुलवंत सिंह, फार्मासिस्ट अंबिका प्रसाद, मनोज सचान सहित अनेक चिकित्सक व फार्मासिस्ट मौजूद थे।
Posted on 12 January 2010 by admin
चित्रकूट- माताओं के बेहतर स्वास्थ्य की पहल के मकसद से स्वास्थ्य विभाग ने स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ मिलकर कार्यशाला का आयोजन किया। मातृत्व मृत्यु दर को कम करने के ग्रामीण महिलाओं को जागरूक करने की बात की गई। कार्यशाला में प्रतिनिधियों ने स्वीकार किया कि अधिकार पाने वाले को खुद जागरूक होना पड़ेगा अन्यथा तमाम संस्थायें मंच टेंट व माइक लगाकर लाखों रुपये डकार कर चली जायेगी और पात्र असहाय ही बना रहेगा।
जिला पंचायत सभागार में आयोजित कार्यशाला में मुख्य चिकित्साधिकारी डा. आर डी राम ने कहा कि प्रदेश में 2007 से लागू राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन योजना के बाद अब तक मातृत्व मृत्युदर कम हो गई है। वर्ष 2007 में मातृत्व मृत्यु दर प्रति एक लाख में 517 थी जो घटकर 440 तक हो गई है। वर्ष 2012 तक इसकी संख्या 100 तक पहुंचाने का लक्ष्य है। सीएमओ ने कहा कि आजकल प्रसूता महिलायें व आशायें 1400 रुपये के लिये स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती है। बच्चा पैदा होने के बाद एक घंटे में चेक लेकर घर चली जाती है। जबकि यह धनराशि जच्चा-बच्चा के अच्छे स्वास्थ्य के लिये दी जाती है। अब विभाग टीकाकरण में भी जच्चा-बच्चा को तीन सौ रुपये प्रदान किये जायेंगे।
मुख्य चिकित्साधीक्षक डा. डी आर सिंह ने कहा कि ज्यादातर महिलाओं को स्वास्थ्य सुविधा पाने के लिये खुद जाग्रत होना पडे़गा। ग्रामीण क्षेत्रों में जन जागरण अभियान चलाना पड़ेगा। समस्याग्रस्त व्यक्ति को किसी भी सुविधा को पाने के लिये अपने अधिकारों को जानना जरूरी है। अपर सीएमओ डा. आर आर सिंह ने कहा कि मातृत्व मृत्युदर कम करने के लिये गांव-गांव में पहुंचकर जागरूकता शिविर लगाना चाहिये। राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के जिला प्रबंधक राजशेखर ने कहा कि कई स्वयंसेवी संस्थायें जच्चा-बच्चा स्वास्थ्य के नाम पर सिर्फ शहरी क्षेत्र में शिविर लगाकर लाखों रुपये का गोलमाल करती है। ज्यादातर ग्रामीण प्रसूता महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी अधिकार पाने के लिये खुद जागरूक होना पड़ेगा। इसके बाद ही मातृत्व मृत्युदर कम होगी।
Posted on 29 December 2009 by admin
दांत की बीमारियों व इससे संबंधित जानकारी देने के लिये दंत विशेषज्ञों की तीन दिवसीय कार्यशाला शुरू हुई। तीन दिवसीय कार्यशाला का शुभारंभ दीन दयाल शोध संस्थान के प्रधान सचिव डा. भरत पाठक ने किया। फ्रांस से आये दंत विशेषज्ञ हगीज बोरी सभी चिकित्सकों को डेंटल लैब में प्रोजेक्टर के सहारे महत्वपूर्ण जानकारी देते रहे। उन्होंने नई बत्तीसी बनाने की तकनीक दिखाते हुये कहा कि अब जल्द ही इसका प्रयोग शुरू हो जायेगा। दीन दयाल शोध संस्थान के डा. वरुण गुप्ता ने कहा कि विदेशों से आयी नई तकनीक को संस्थान बेहद सस्ते में मरीजों को उपलब्ध करा रहा है। दंत विभाग के प्रभारी डा. गुप्ता ने बताया कि नई तकनीक का प्रयोग करने के लिये दो रोगियों का चयन कर लिया गया है।
Posted on 27 December 2009 by admin
जिला अस्पताल का भवन छोटा पड़ने के कारण व मरीजों की अधिकता और जरुरत के मुताबिक शासन खाली पड़ी जमीन पर चार करोड़ की लागत से नवीन दो मंजिला भवन का निर्माण कराने जा रही है। इसके लिए यूपी पीसीएल का नक्शा भी स्वीकृत हो चुका है। नये साल के पहले माह में निर्माण कार्य शुरू होने की संभावना है।
अस्पताल परिसर में बने क्षेत्रीय निदान केंद्र के सामने पड़ी खाली जमीन में बनने वाला यह नवीन भवन आधुनिक उपचार व्यवस्था से लैश होगा। इसमें बनने वाली इमरजेंसी वार्ड में आठ बाई छह मीटर का लंबा-चौड़ा वार्ड बनेगा। जिसमें करीब दो दर्जन मरीजों को एक साथ सघन उपचार की व्यवस्था होगी। इसके अलावा ट्रीटमेंट रूम, नर्सेज ड्यूटी रूम, एमओ रूम, दवा वितरण कक्ष, माइनर ओटी, प्लास्टर रूम, सर्जन व आर्थोपैडिक रूम के अलावा छह हाल व एक प्रतीक्षालय बनेगा। इन्हीं एक में सघन चिकित्सा कक्ष बनाया जायेगा। दूसरी मंजिल में पांच वार्ड, एक नर्सेज ड्यूटी रूम, चार सेमी प्राइवेट वार्ड व आठ प्राइवेट वार्ड बनाये जायेंगे। इसके अलावा चिकित्सा के अत्याधुनिक उपकरणों से लैश दो ऑपरेशन थ्रियेटर, कारीडोर, प्रतीक्षालय लावी व पोस्ट अपर्टेटिव पेसेंट , स्टोर, नर्सेज रेस्ट रूम आदि की व्यवस्था होगी। सेंटर स्टोर में ऑक्सीजन सिलेंडर, एसएमओ रूम व कंप्यूटर कक्ष, फार्मेसिस्ट कक्ष व शीत श्रंखला कक्ष कक्ष का निर्माण कराया जायेगा। मरीजों के साथ आये तीमारदारों को किसी तरह की असुविधा न हो इसके लिए अस्पताल से सटा रैन बसेरा बनाया जायेगा। इसमें दो बड़े-बड़े हालों में तीमारदारों के रुकने व खाने की सुविधा होगी। इसके लिए स्टोर व कैंटीन भी इसी में बनाया जायेगा।
अपर निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. गोपाल सिंह धानिक ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि यह चिकित्सालय आधुनिक उपचार व्यवस्था से पूरी तरह लैश होगा। इसका निर्माण शीघ्र ही कार्यदायी संस्था शुरू करेगी।
Posted on 16 December 2009 by admin
प्रगति और विकास के माध्यम से स्थापित होने वाली जीवन-शैली ही दरअसल आधुनिकता है, जिसके प्रभाव से समय-समय पर मानवीय जीवन-मूल्यों में कभी थोड़े- बहुत तो कभी आमूल परिवर्तन आते हैं- सामाजिक स्तर पर भी, और व्यक्तिगत स्तर पर भी। चूंकि ऐसे परिवर्तन हमेशा ही नयी पीढ़ी का हाथ पकड़कर समाज में प्रवेश करते हैं, अक्सर बुज़र्ग पीढ़ी की स्वीकृति इन्हें आसानी से नहीं मिलती। वे इन्हें अनैतिक कह देते हैं। असामाजिक और पतनोन्मुख करार देते हैं। सचाई यह है कि ज्ञान-विज्ञान के नये-नये आविष्कारों की वजह से वजूद में आये मूल्य पतित नहीं हो सकते। अमानवीय या असामाजिक या अनैतिक नहीं हो सकते । बल्कि इन्हीं मूल्यों को अपनाकर व्यक्ति प्रगति और विकास का वास्तविक लाभ ले सकता है। जो नहीं अपनाता, वह पिछड़ जाता है।
माँ कौन होती है ये सवाल काफी अटपटा लग रहा है , यदि ये सवाल है तो इसका जवाब है माँ वो है जो हमे जन्म देती है । पर आज हमारी बदलती सोच और बढती जरूरतों ने वैज्ञानिक खोज को वंहा पहुंचा दिया है जहाँ हम यह सोचने पर मजबूर है भारत में एक और धंधा अब तेज़ी से फलने फूलने जा रहा है वह है किराये पर कोख का। दरअसल किराये की कोख(सेरोगेट मदर) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत निःसंतान दम्पति डॉक्टरों के सलाह पर किसी अन्य महिला की कोख खरीदते है , और फिर डॉक्टरों द्वारा दम्पति के अंडाणु और सुक्राणु को निषेचित कर महिला के कोख में स्थापित किया जाता है , बच्चा जन्म लेने के कुछ ही देर बाद दम्पति के हवाले कर दिया जाता है ,और कोख बेचने वाली महिला को उसकी कीमत अदा की जाती है । यही पुरी प्रक्रिया है ।
निःसंकोच किराये की कोख ने निःसंतान दम्पति के जीवन में एक नई आशा की किरण जगाई है पर इससे जुरे कई ऐसे सवाल है जिसपर गहन चिंतन की आवश्यकता है .निःसंतान दम्पति पहले अनाथालय से बच्चे गोद लिया करते थे सेरोगेसी के आजाने से इसमे कमी आई है । .करियर के प्रति समर्पित महानगर की महिलाये बच्चे पैदा करने में अपना वक्त नही बर्बाद करना चाहती वो सेरोगेसी अपनाना बेहतर समझती है । रही बात बच्चे की तो उसे जन्म देने वाली माँ का दूध नसीब नही होता ऐसे बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास कैसा होगा कहना मुस्किल है ,खैर इससे जुरे और कई सवाल है पर जहाँ तक भारतीय सेरोगेसी का सवाल है इसमे अधिकांशतः गरीब तबके की महिलाये हीं शामिल हो रही है ,मामला साफ है वो अपने और अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए मातृत्व की भावना को ताक पर रख इसे एक व्यवसाय के रूप में अपना रही है । हमारे देश में सेरोगेसी का बाज़ार काफी तेजी से बढ़ रहा है ,विदेशी भी काफी संख्या में आ रहे हैं क्योंकि यंहा उन्हें अपने देश के मुकाबले काफी कम दामो में संतान सुख प्राप्त हो जाता है ।
प्रगति और विकास के माध्यम से स्थापित होने वाली जीवन-शैली ही दरअसल आधुनिकता है, जिसके प्रभाव से समय-समय पर मानवीय जीवन-मूल्यों में कभी थोड़े- बहुत तो कभी आमूल परिवर्तन आते हैं- सामाजिक स्तर पर भी, और व्यक्तिगत स्तर पर भी। चूंकि ऐसे परिवर्तन हमेशा ही नयी पीढ़ी का हाथ पकड़कर समाज में प्रवेश करते हैं, अक्सर बुज़र्ग पीढ़ी की स्वीकृति इन्हें आसानी से नहीं मिलती। वे इन्हें अनैतिक कह देते हैं। असामाजिक और पतनोन्मुख करार देते हैं। सचाई यह है कि ज्ञान-विज्ञान के नये-नये आविष्कारों की वजह से वजूद में आये मूल्य पतित नहीं हो सकते। अमानवीय या असामाजिक या अनैतिक नहीं हो सकते । बल्कि इन्हीं मूल्यों को अपनाकर व्यक्ति प्रगति और विकास का वास्तविक लाभ ले सकता है। जो नहीं अपनाता, वह पिछड़ जाता है।
माँ कौन होती है ये सवाल काफी अटपटा लग रहा है , यदि ये सवाल है तो इसका जवाब है माँ वो है जो हमे जन्म देती है । पर आज हमारी बदलती सोच और बढती जरूरतों ने वैज्ञानिक खोज को वंहा पहुंचा दिया है जहाँ हम यह सोचने पर मजबूर है भारत में एक और धंधा अब तेज़ी से फलने फूलने जा रहा है वह है किराये पर कोख का। दरअसल किराये की कोख(सेरोगेट मदर) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत निःसंतान दम्पति डॉक्टरों के सलाह पर किसी अन्य महिला की कोख खरीदते है , और फिर डॉक्टरों द्वारा दम्पति के अंडाणु और सुक्राणु को निषेचित कर महिला के कोख में स्थापित किया जाता है , बच्चा जन्म लेने के कुछ ही देर बाद दम्पति के हवाले कर दिया जाता है ,और कोख बेचने वाली महिला को उसकी कीमत अदा की जाती है । यही पुरी प्रक्रिया है । निःसंकोच किराये की कोख ने निःसंतान दम्पति के जीवन में एक नई आशा की किरण जगाई है पर इससे जुरे कई ऐसे सवाल है जिसपर गहन चिंतन की आवश्यकता है .निःसंतान दम्पति पहले अनाथालय से बच्चे गोद लिया करते थे सेरोगेसी के आजाने से इसमे कमी आई है । .करियर के प्रति समर्पित महानगर की महिलाये बच्चे पैदा करने में अपना वक्त नही बर्बाद करना चाहती वो सेरोगेसी अपनाना बेहतर समझती है । रही बात बच्चे की तो उसे जन्म देने वाली माँ का दूध नसीब नही होता ऐसे बच्चे का शारीरिक और मानसिक विकास कैसा होगा कहना मुस्किल है ,खैर इससे जुरे और कई सवाल है पर जहाँ तक भारतीय सेरोगेसी का सवाल है इसमे अधिकांशतः गरीब तबके की महिलाये हीं शामिल हो रही है ,मामला साफ है वो अपने और अपने परिवार की गरीबी दूर करने के लिए मातृत्व की भावना को ताक पर रख इसे एक व्यवसाय के रूप में अपना रही है । हमारे देश में सेरोगेसी का बाज़ार काफी तेजी से बढ़ रहा है ,विदेशी भी काफी संख्या में आ रहे हैं क्योंकि यंहा उन्हें अपने देश के मुकाबले काफी कम दामो में संतान सुख प्राप्त हो जाता है ।
Posted on 06 December 2009 by admin
विश्व स्वास्थ्य संगठन के नए बाल वृद्धि मानकों पर बाल विकास परियोजना कर्मियों की दक्षता हेतु आज एक दिवसीय शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में निपिस्ड लखनऊ के ट्रेनर ललित मोहन श्रीवास्तव ने चार्ट के माध्यम से बाल वृद्धि के नये मानकों की विस्तार से समस्या और समस्याओं का समाधान किया। उन्होंने बच्चों की ग्रोथ और कुपोषण को किस प्रकार कम किया जा सकता है, इसकी भी जानकारी दी।
श्रीवास्तव ने बताया कि अब तक बच्चों की ग्रोथ का चार्ट देश में किये गये सर्वे के आधार पर ही किया जाता था, लेकिन अब विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा छ: देशों के सर्वे के बाद नया बाल वृद्धि मानक निर्धारित किया है। इसी आधार पर बच्चों की ग्रोथ का तरीका निकाला गया है। सर्वे के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया है कि बच्चों की ग्रोथ किस प्रकार बढ़ाई जाना चाहिये। उन्होंने नये मानकों के अनुरूप ग्रोथ चार्ट भरने का आसान तरीका भी बताया। साथ ही बच्चों को कुपोषण से बचाने के उपाय भी बताये। उन्होंने बताया कि छोटे बच्चों की वृद्धि पर निगरानी एवं प्रोत्साहन आगनवाड़ी कार्यकर्ता का एक महत्वपूर्ण दायित्व है। वृद्धि पर निगरानी का अर्थ है बचचे की वृद्धि और विकास पर मुख्य पोषक संकेतकों जैसे कि आयु के अनुसार वजन या लम्बाई द्वारा नजर रखना।
उन्होंने बताया कि वृद्धि पर निगरानी से अल्पपोषण को रोका जा सकता है। साथ ही वजन में गिरावट या वृद्धि में कमी के कारणों का पता लगाया जा सकता है। नए मानकों के अनुरूप लड़कियों और लड़कों के लिये अलग-अलग वृद्धि चार्ट तैयार किये गये है, क्योंकि जन्म के समय दोनों का वजन और लम्बाई अलग-अलग होती है और उम्र बढ़ने के साथ ही उनका वजन और कद-काठी भिन्न प्रकार से बढ़ते है। वृद्धि चार्ट से इस बात का पता लगाया जा सकता है कि आने वाले समय में बच्चें की वृद्धि में किस प्रकार की समस्या आ सकती है।
इस मौके पर ट्रेनर दीनानाथ मिश्र, जिला कार्यक्रम अधिकारी प्रदीप कुमार, सीडीपीओ नरेन्द्र सिंह सहित जनपद के समस्त सीडीपीओ, आगनवाड़ी केन्द्रों की मुख्य सेविकायें, बीएफएचआई के जिला कॉर्डिनेटर प्रवीण कुमार, बिरधा मॉनीटर इन्द्र मोहन ओझा, जखौरा ब्लॉक मॉनीटर राजेन्द्र मालवीय, सुपरवाईजर अशोक पाण्डेय इत्यादि मौजूद रहे।
Posted on 04 December 2009 by admin
एड्स यानि एक्वायर्ड इम्युनो डिफिशिएन्सी सिन्ड्रोम। एक ऐसी बीमारी जो एक बार लग जाये तो जान लेकर ही छोड़ती है। अब तक इस बीमारी का कोई कारगर इलाज पूरी दुनिया में नहीं खोजा जा सका है। बचाव का सिर्फ एक ही तरीका है, जागरूकता और जानकारी। झाँसी की बात करे तो यह नगरी भी इस जानलेवा रोग से अछूती नहीं है। चालू वर्ष में जनवरी से अब तक कुल 545 लोग झाँसी जिले में जनवरी माह से लेकर अब तक 51103 लोगों की काउंसिलिंग की जा चुकी है। इनमें 17416 पुरुष व 33683 महिलायें तथा 4 किन्नर शामिल है। इनमें से 43367 का परीक्षण किया गया है। इनमें 14463 पुरुष व 28900 महिलायें तथा 4 किन्नर शामिल है। परीक्षण के बाद कुल 545 मामले एड्स के पॉजिटिव पाये गये। इनमें 337 पुरुष व 184 महिलायें शामिल है। इनमें 428 रोगी झाँसी के, 60 रोगी झाँसी के बाहर के, 57 रोगी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बाहर के रहने वाले है।
मुख्य चिकित्साधिकारी के अनुसार झाँसी में एड्स के परीक्षण की पूरी सुविधा तथा किट्स उपलब्ध है। शासन को ए.आर.टी. केन्द्र, कम्युनिटी केयर सेन्टर तथा ड्राप-इन सेन्टर खोले जाने के लिये प्रस्ताव भेजे जा चुके है, लेकिन अभी तक कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला है।
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Ph-09415060119