कुदरत  का  कहर  क़यामत  के  आने   की  दस्तक  है  पानी  ही  पानी. इस से भी ख़राब हालात होंगे २०१२ में   ये परिणाम है  कुदरत से खिलबाड़ का........ “Plant Trees to Save Environment” , *खाकी वर्दी वालो के कारनामे-जनता की जुवानी * सफेद कुर्ते वाले नेताओ के कारनामे-जनता की जुवानी "bundelkhandlive.com" पर, आप के पास है कोई जानकारी तो आप भी बन सकते है सिटी रिपोर्टर हमें मेल करे editor@upnewslive.com पर या 09415060119 फ़ोन करे , SPC मीडिया ग्रुप पेश करते है <UPNEWS>मोबाईल sms न्यूज़ एलर्ट के लिए अगर आप भी कहते है अपने और प्रदेश की खबरे अपने मोबाईल पर तो अपना <नाम-, पता-, अपना जॉब,- शहर का नाम, - टाइप कर 09415060119 पर sms, प्रदेश का पहला हिन्दी न्यूज़ पोर्टल जिसमे अपने प्रदेश की खबरें सरकार की योजनाएँ,प्रगति,मंत्रियो के काम की प्रगति www.upnewslive.com पर

Archive | धर्म

शिव पूजा हर सुख देती है

Posted on 09 August 2010 by admin

सावन सोमवार को व्रत रखकर भगवान शिव की शास्त्रों में बताई विशेष विधि से पूजा शीघ्र फल देने वाली मानी गई है। जानते हैं क्या है सावन के सोमवार को शिव पूजा की यह विधि -

- श्रावण सोमवार को सूर्योदय के पहले जागें।
- घर का साफ-सफाई कर शरीर शुद्धि के लिए स्नान करें। सफेद वस्त्र पहनकर पूजा स्थल पर बैठें।
- स्नान के बाद गंगा जल, पवित्र नदी या जल स्त्रोत के जल से पूरे घर को पवित्र करें।
- घर में देवस्थान पर भगवान शिव-पार्वती और गणेश की मूर्ति पूजा के लिए स्थापित करें। - इसके बाद सबसे पहले व्रत संकल्प लें। मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये।
- इसके बाद प्रथम पूज्य देवता भगवान श्री गणेश का ध्यान और पूजा करें।
- श्री गणेश ध्यान और पूजा के बाद भगवान शिव ध्यान करने के लिए मंत्र का मन ही मन उच्चारण करें
- ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं
रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैव्र्याघ्रकृत्तिं वसानं
विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम॥
- ध्यान के बाद शिव के पंचाक्षरी या षडाक्षरी मंत्र ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ से पार्वतीजी का षोडशोपचार पूजन करें।
- षोडशोपचार में सोलह प्रकार और सामग्रियों से देव आराधना की जाती है।
- शिव आराधना में विशेष रुप से बेल पत्र, भांग, धतूराए जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, जनेऊ , चंदन, रोली, धूप, दीप और दक्षिणा को शामिल कर पूजा की जाती है।
- शिव-पार्वती पूजा के बाद सोमवार व्रत कथा का पाठ या श्रवण करना चाहिए।
- अंत में पूरी भक्ति और आस्था के साथ शिव आरती करें। प्रसाद वितरण करें। पूजा के दौरान हुए दोष के लिए क्षमा मांगे। अपनी कामना पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।
- सायंकाल प्रदोषकाल में भी शिव पूजा करें और रात्रि में भोजन करें। यथा संभव उपवास करें।
Vikas Sharma
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शिव की तीन आंखें क्यों हैं?

Posted on 09 August 2010 by admin

शिव अनोखेपन और विचित्रताओं का भंडार हैं। शिव की तीसरी आंख भी ऐसी ही है। धर्म शास्त्रों के अनुसार सभी देवताओं की दो आंखें हैं पर शिव की तीन आंखें हैं।

भगवान शिव अपने कर्मों से तो अद्भुत हैं ही; अपने स्वरूप से भी रहस्यमय हैं। भक्त से प्रसन्न हो जाएं तो अपना धाम उसे दे दें और यदि गुस्सा हो जाएं तो उससे उसका धाम छीन लें।

दरअसल शिव की तीसरी आंख प्रतीकात्मक नेत्र है। आंखों का काम होता है रास्ता दिखाना और रास्ते में पढऩे वाली मुसीबतों से सावधान करना।जीवन में कई बार ऐसे संकट भी आ जाते हैं; जिन्हें हम अपनी दोनों आंखों से भी नहीं देख पाते। ऐसे समय में विवेक और धैर्य ही एक सच्चे मार्गदर्शक के रूप में हमें सही-गलत की पहचान कराता है। यह विवेक अत:प्रेरणा के रूप में हमारे अंदर ही रहता है। बस जरुरत है उसे जगाने की।

भगवान शिव का तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र का स्थान है। यह आज्ञाचक्र ही विवेकबुद्धि का स्रोत है।

Vikas Sharma
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शिव का अभिषेक क्यों करते हैं?

Posted on 04 August 2010 by admin

अभिषेक शब्द का अर्थ है स्नान करना या कराना। यह स्नान भगवान मृत्युंजय शिव को कराया जाता है। अभिषेक को आजकल रुद्राभिषेक के रुप में ही ज्यादातर पहचाना जाता है। अभिषेक के कई प्रकार तथा रुप होते हैं। किंतु आजकल विशेष रूप से रुद्राभिषेक ही कराया जाता है। रुद्राभिषेक का मतलब है भगवान रुद्र का अभिषेक यानि कि शिवलिंग पर रुद्रमंत्रों के द्वारा अभिषेक करना। रुद्राभिषेक करना शिव आराधना का सर्वश्रेष्ठ तरीका माना गया है। शास्त्रों में भगवान शिव को जलधाराप्रिय:, माना जाता है। भगवान रुद्र से सम्बंधित मंत्रों का वर्णन बहुत ही पुराने समय से मिलता है। रुद्रमंत्रों का विधान ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में दिये गए मंत्रों से किया जाता है। रुद्राष्टाध्यायी में अन्य मंत्रों के साथ इस मंत्र का भी उल्लेख मिलता है।

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अभिषेक में उपयोगी वस्तुएं:
अभिषेक साधारण रूप से तो जल से ही होता है। विशेष अवसर पर या सोमवार, प्रदोष और शिवरात्रि आदि पर्व के दिनों में गोदुग्ध या अन्य दूध मिला कर अथवा केवल दूध से भी अभिषेक किया जाता है। विशेष पूजा में दूध, दही, घृत, शहद और चीनी से अलग-अलग अथवा सब को मिला कर पंचामृत से भी अभिषेक किया जाता है। तंत्रों में रोग निवारण हेतु अन्य विभिन्न वस्तुओं से भी अभिषेक करने का

है।

Vikas Sharma
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धूमधाम के साथ मनाया गया रामजन्मोत्सव

Posted on 24 March 2010 by admin

चित्रकूट - राम नवमी के पावन पर्व पर  भए प्रकट कृपाला, दीन दयाल की धुन से प्रभु श्री राम की तपोभूमि गुंजायमान हो उठी। वहीं दूसरी ओर शक्ति की देवी मां दुर्गा के उपासकों ने जवारे आदि निकाल नौ दिनों तक चलने वाले व्रत का  पारन करते हुए व्रत तोड़ा। पूरे जिले में जगह-जगह राम जनमोत्सव बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया गया। बुधवार की दोपहर घड़ी में ठीक बारह बजते ही प्रभु श्री राम की तपोस्थली चित्राकूट सहित पूरे जिले के मन्दिरों में राम धुन व  भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला आदि भजनों से माहौर राममय हो गया है।

24ckt11भक्तों ने अपने-अपने तरीके से राम जन्मोत्सव का आनन्द उठाया। चित्रकूट स्थिति निर्मोही अखाड़ा, कांच मन्दिर, रघुवीर मन्दिर, कामतानाथ प्रमुख द्वार, भरत मन्दिर आदि स्थानों सहित पूरे चित्रकूट में जगह-जगह भक्तों द्वारा आयोजित किए गए भण्डारों में हजारों की संख्या में श्रृद्धालुओं ने भगवान का प्रसाद चखा। इस दौरान भजन कीर्तन का आयोजन भी किया।

रामचरित मानस के रचईता गोस्वामी तुलसीदास की जन्म स्थली राजापुर में पवित्रा यमुना किनारे स्थित तुलसी मन्दिर में भी प्रभु श्री राम का जन्मोत्सव धूमधाम के साथ मनाया गया। इसके अलावा नान्दी गांव स्थित तुलसी द्वारा पूजित बजरंग बली के मन्दिर व शिवरामपुर में लाइना बाबा हनुमान मन्दिर में भी भक्तों ने भण्डारों का आयोजन किया था जिसमें आस पास के क्षेत्रो से पहुंचे लोगों ने प्रसाद का आनन्द लिया। 24ckt7

इसी के साथ लोगों ने शक्ति की देवी मां दुर्गा की उपासना का समापन किया। नौ दिनों तक चलने वाले व्रत के बाद मां के उपासक अपने-अपने घरों में बोए गए जवारे ले मुख्यालय के पुरानी बाजार स्थिति काली मन्दिर पहुंच मां की पूजा अर्चना करते हुए अपने व्रत का पालन किया। वहीं कुछ भक्त जवारे व सांग लेकर मां की भक्ति में डूबे हुए प्रसिद्ध बंधोइन माता मन्दिर व शंकर बाजार स्थित काली मंन्दिर में भी पहुंचे और मां दुर्गा की विधिवत पूजा अर्चना की। नवमी के अवसर पर मां की पूजा करने के लिए बड़े सवेरे से ही मां के प्रसिद्ध मन्दिरों में भक्तों की भीड़ लगने लगी थी। महिलाएं मां के भोग में चढ़ाए जाने वाली अठवाई, बाताशा, हलुवा व नारियल आदि लेकर मन्दिरों में सबेरे से ही पहुंचने लगी थी। मन्दिर पहुंच महिलाओं ने मां को भोग लगाते हुए अपनी मन्नते पूरी करने के लिए प्रार्थना की। जिला मुख्यालय से लगभग 20 किमी दूर स्थित लाला गांव में अशावर माता के प्रसिद्ध मन्दिर में भी भक्तों ने मां के दर्शन करते हुए पूजा अर्चना की। बेतहाशा धूप व गर्मी की परवाह किए बिना लोग मां की पूजा के लिए मन्दिरों में शाम तक डटे रहे। इसी तरह मऊ तहसील स्थित आनन्दी माता के मन्दिर व राजापुर की जालपामाई के मन्दिर में श्रृद्धालुओं का रेला सबेरे से ही जुटना शुरू हो गया था। इस दौरान मन्दिरों के व्यवस्थापकों द्वारा माता के मन्दिरों को आकर्षक ढंग से सजाया गया था। पुरानी बाजार स्थिति काली माता के मन्दिर में नवमी के अवसर पर बुधवार की सबेरे छोटी-छोटी कन्याओं को कन्या भोज भी कराया गया था। उधर राजापुर, रामनगर, मानिकपुर, सीतापुर, पहाड़ी सहित ग्रामीण इलाकों में लोगों ने जवारे व सांग आदि निकाल मां की पूजा अर्चना करते हुए अपने-अपने व्रतों का समापन किया।  काफी बड़ी संख्या में दूर-दूर से चित्रकूट आए भक्तों ने राम जन्मोत्सव का आनन्द लेने के बाद भगवान कामदगिरि की परिक्रमा भी की।

श्री गोपाल
09839075109
bundelkhandlive.com

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प्रेम के वशीभूत हो कर निराकार ब्रम्ह हो जाता है साकार

Posted on 19 March 2010 by admin

राम कथा का आयोजन शुरू

चित्रकूट - ईश्वर को किसी भी चीज को किसी चीज का लालच देकर नहीं प्राप्त किया जा सकता।  वह तो बस नि:स्वार्थ प्रेम का भूखा है। अपना सुख-दुख भूलकर केवल ईश्वर का हो जाने से ही उसकी प्राप्ति होती है। यह भक्त का नि:स्वार्थ प्रेम ही है जो निराकार ब्रम्ह् को साकार बना देता है। नवरात के अवसर पर जानकीकुण्ड स्थित रघुवीर मन्दिर ट्रस्ट बड़ी गुफा में सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट द्वारा रामचरित मानस कथा का आयोजन किया गया है। जिसमें भोपाल से आए मृदुल जी महाराज संगीतमयी रामकथा का रसपान भक्तों को करा रहे हैं।

उन्होंने कहा कि मानव सेवा से बढ़ कर कोई सेवा नहीं है। उन्होंने कहा कि राम कथा वह कथा है जो परिवार, समाज, देश का ही नहीं बल्कि तीनों लोकों का कल्याण करती है। उन्होंने कहा कि जिस तरह पवित्रा पावनी मां गंगा से लोग पवित्रा होकर निकलते हैं। उसी तरह रामकथा रूपी गंगा में स्नान करने से हमारा जीवन धन्य हो जाता है। उन्होंने कहा कि भागीरथी गंगा का स्थान तो सीमित है लेकिन रामकथा रूपी गंगा की कोई सीमा नहीं है। रामकथा वाचक मृदुल जी महाराज ने कहा कि जिस प्रकार पवित्रा पावन मां गंगा के द्वारा हर वर्ग के लोगों के लिए खुले हैं उसी प्रकार रामकथा भी बिना किसी भेदभाव के सबका कल्याण करती है। ऐसी महंगाई के समय में भी प्रभु से सस्ता और कुछ नहीं है। ईश्वर को यदि पाना है तो उससे बिना किसी स्वार्थ के ही प्रेम करना होगा। अपना स्वार्थ भूल कर ही मीरा ने कृष्ण की भक्ति की जिस पर रीझ कर ही मीरा को दिया गया जहर उन्होंने अमृत में बदल दिया था।  जहां सुमति तहां संपति नाना, जहां कुमति तहां विपति निधाना। की व्याख्या करते हुए कहा कि महाराज मनु और रानी सतरूपा की सुमति के कारण ही उन दोनों ने परमात्मा के दर्शन किए थे। कहा कि भगवान किसी को कष्ट नहीं देते बल्कि कष्टों का निवारण करते हैं। उन्होंने कहा कि हमारा देश ऋषि और कृषि प्रधान देश है। ऋषि मुनियो ने यज्ञ हवन करके भगवान राम को प्रगट किया और महराज जनक ने हल चलाकर सीता को प्रगट किया। बच्चों को प्रेरणा देते हुए कहा कि उनके लिए तो माता-पिता ही साक्षात ईश्वर हैं। एक भक्त भगवान की सेवा करके जितना पुण्य कमाता है उससे कहीं ज्यादा पुन्य  माता-पिता की सेवा करके प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चैत्रा मास शुक्ल पक्ष की नवमी के दिन भगवान राम ने अवतार लिया था इसी लिए यह चैत्रा मास का प्रमुख महत्व है। इसी माह में ही तुलसीदास की रामचरित मानस का प्रादुर्भाव हुआ था। रामचरित मानस मात्रा सुनन के लिए बल्कि अपने जीवन में उतारने के लिए है। तभी हम सबका कल्याण होगा।

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महाशिवरात्रि दिन शिवलिंग की उत्पत्ति…

Posted on 11 February 2010 by admin

शिव पुराण के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग की उत्पत्ति हुई थी, इसीलिए इस दिन किया गया शिव पूजन, व्रत और उपवास अनंत फल दायी होता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार श्रध्दालु भक्त अपनी राशि के अनुसार भी भगवान शिव की आराधना और पूजन कर मनोवांछित फल प्राप्त कर सकते हैं । महाशिव रात्रि के दिन किसी भी राशि का जातक पंचामृत से शिवलिंग का अभिषेक कर सफेद अर्क के फूल चढ़ाकर चंदन से प्रणव (ॐ) बनाकर भी उपासना कर सकते हैं ।

तिल स्नान कर करें शिव पूजा- फागुन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को महाशिव रात्रि महोत्सव मनाया जाता है । त्रयोदशी को एक बार भोजन करके चतुर्दशी को दिन भर अनन नहीं ग्रहण करना चाहिए । इसके अलावा यह भी मान्यता है कि काले तिलों से स्नान करके रात्रि में विधिवत शिव पूजन करना चाहिए । भगवान शिव के सबसे प्रिय पुष्पों में कनेर, बेल पत्र तथा मौलसिरी है । लेकिन पूजन विधान में बेलपत्र सबसे प्रमुख है । शिवजी पर पका आम चढ़ाने से विशेष फल प्राप्त होता है ।

लोक मंगलकारी है रूद्र शिव- शिवलिंग पर चढ़ाए गए पुष्प, फल तथा जल को नहीं ग्रहण करना चाहिए । भघवान ब्रह्मा जी की तीन शक्तियों में ब्रह्मा, विष्णु, महेश का नाम उल्लेखनीय है। इन्हीं शक्तियों मे ंएक रूलाने के कारम रूद्र तथा दूसरा जगत कल्याण करने के कारण शिवके नाम से जाना जाता है। सामान्यत: देखने में दोनों नाम परस्पर विरोधी लगते हैं मगर सृष्टिक्रम के अनुसार लोक मंगलकारी है ।

मेष - गुड़ के जल से अभिषेक करे । मीठी रोटी का भोग चढ़ाएं लाल चंदन व कनेर की फूल से पूजा करें ।
वृष- दही से अभिषेत करे। शक्कर, चांवल, सफेद चंदन सफेद फूल से पूजा करे ।
मिथुन - गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करें. मुंग , दूब और कुशा से पूजा करे ।
कर्क - घी से अभिषेत कर चावल, कच्चा दूध, सफेद आक व शखपुष्पी से शिवलिंग की पूजा करें ।
सिंह - गुड़ के जल से अभिषेक कर गुड़ व चावल से बनी खीर का भोग लाकर गेहूं के चूरे और मंदार के फूल से पूजा करें ।
कन्या - गन्ने के रस से शिवलिंग का अभिषेत करे । भगवान शंकर को भांग, दूब व पान अर्पित करे ।
तुला - सुगंधित तेल या इत्र से भगवान का अभिषेक कर दही, मधुरस व श्रीखंड का भोग लगाएं । सफेद फूल से भगवान की पूजा करें ।
वृश्चिक - पंचामृत से अभिषेत करे । लाल गोझिया फूल से भगवान की पूजा करें ।
धनु - हल्दी युक्त दूध से अभिषेत कर केश्री और बेसन से बनी मिठाई से भगवान का भोग लगाएं । गेंदे के फूल से उनकी पूजा करें ।
मकर - नारियल पानी से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठआई का भगवान को भोग लगाएं । नीलकमल के फूल उनकी पूजा करे ।
कूंभ - तिल के तेल से अभिषेक कर उड़द से बनी मिठआई का भोग लगाए । शमी के फूल से भगवान की पूजा करे ।
मीन - केसरयुक्त दूध से भगवान का अभिषेक कर दही भात का भोग लगाएं । पीली सरसों और नागकेसर से भगवान की पूजा करें ।

‘स्मृत्यंतर’ में कहा गया है कि शिवरात्रि में चतुर्दशी प्रदोषव्यापिनी ग्रहण करें। यहां प्रदोष शब्द से मतलब ‘रात्रि का ग्रहण’ है। अत: रात्रि में जागरण करें और उसमें उपवास करें। उत्तरार्ध में उसका कारण बताया गया है। ‘कामिक’ में भी कहा गया है कि सूर्य के अस्त समय यदि चतुर्दशी हो, तो उस रात्रि को ‘शिवरात्रि’ कहते हैं। यह उत्तमोत्तम होती है। आधी रात के पहले और आधी रात के बाद यदि चतुर्दशी युक्त न हो, तो व्रत को न करें, क्योंकि ऐसे समय में व्रत करने से आयु और ऐश्वर्य की हानि होती है। माधव मत से ‘ईशान संहिता’ में कहा गया है कि जिस तिथि में आधी रात को चतुर्दशी की प्राप्ति होती है, उसी तिथि में मेरी प्रसन्नता से मनुष्य अपनी कामनाओं के लिए व्रत करें।

विधि-विधान

महाशिवरात्रि का व्रत सभी वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) और प्रत्येक समुदाय के स्त्री-पुरुष, बच्चे, युवा, वृद्ध के लिए मान्य है। अत: आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति मंत्रों और पूजा विधि का ज्ञान रखता हो। अपने भक्ति भाव और श्रद्धा के अनुसार शिव पूजन कर सकते हैं। धन का सार्मथ्य हो, तो किसी ब्राह्मण से विधि-विधान से पूजन कराएं। रुद्राभिषेक, रुदी पाठ, पंचाक्षर मंत्र का जाप आदि कराएं। व्रत करने वाली स्त्री को इस दिन प्रात: स्नानादि के बाद दिनभर शिव का स्मरण करना चाहिए। सायंकाल में पुन: स्नान करके भस्म का त्रिपुंड और रुदाक्ष की माला धारण करें। इसके बाद धूप, पुष्पादि व अन्य पूजन सामग्री सहित शिव के समीप पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके बैठें। शिवजी का यथाविधि पूजन करें। रात्रि के प्रथम प्रहर में संकल्प करके दूध से स्नान तथा ‘ओम हीं ईशानाय नम:’ का जाप करें। द्वितीय प्रहर में दधि स्नान करके ‘ओम् हीं अधोराय नम:’ का जाप करें। तृतीय प्रहर में घृत स्नान एवं मंत्र ‘ओम हीं वामदेवाय नम:’ तथा चतुर्थ प्रहर में मधु स्नान एवं ‘ओम् हीं सद्योजाताय नम:’ मंत्र का जाप करें।

सम्पूर्ण पूजा विधि के दौरान ‘ओम नम: शिवाय’ एवं ‘शिवाय नम:’ मंत्र का जाप करना चाहिए। ध्यान, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पय: स्नान, दधि स्नान, घृत स्नान, गंधोदक स्नान, शर्करा स्नान, पंचामृत स्नान, गंधोदक स्नान, शुद्धोदक स्नान, अभिषेक, वस्त्र, यज्ञोपवीत, उवपसत्र, बिल्व पत्र, नाना परिमल दव्य, धूप दीप नैवेद्य करोद्वर्तन (चंदन का लेप) ऋतुफल, तांबूल-पुंगीफल, दक्षिणा उपर्युक्त उपचार कर ‘समर्पयामि’ कहकर पूजा संपन्न करें। कपूर आदि से आरती पूर्ण कर प्रदक्षिणा, पुष्पांजलि, शाष्टांग प्रणाम कर पूजन कर्म शिवार्पण करें। चारों प्रहर का पूजन अवश्य करें।

शिवरात्रि के व्रत की विशेषता है कि इस व्रत का पारण चतुर्दशी में ही करना चाहिए। यह पूर्वाद्धि (प्रदोषनिशीथी) चतुर्दशी होने से ही हो सकता है, जो महाशिवरात्रि पर होती है। जो व्यक्ति संपूर्ण विधि से व्रत करने में असमर्थ हों, वे रात्रि के आरंभ में तथा अर्द्धरात्रि में भगवान शिव का पूजन करके व्रत पूर्ण कर सकते हैं। यदि इस विधि से भी व्रत नहीं कर सकें, तो पूरे दिन व्रत करके सायंकाल में भगवान शंकर की यथाशक्ति पूजा-अर्चना करके भी व्रत पूर्ण कर सकते हैं। इस तरह भी भगवान शिव की कृपा से जीवन में सुख और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है ।

कथा और मान्यताएं
नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों ने सूत जी को प्रणाम कर शिवरात्रि व्रत के संबंध में प्रश्न किया, ‘हे सूत जी! पूर्व काल में किसने इस उत्तम शिवरात्रि व्रत का पालन किया था और अनजान में भी इस व्रत का पालन करके किसने कौन-सा फल प्राप्त किया था? इसका उत्तर उन्हें ऐसे मिला -’एक धनवान मनुष्य शिवरात्रि के दिन शिव मंदिर में गया। एक सौभाग्यवती स्त्री वहां पूजन में लीन थी। धनिक ने उसके आभूषण चुरा लिए। लोगों ने उसके कृत्य से क्षुब्ध होकर उसे मार डाला, किंतु चोरी करने के लिए धनिक आठों प्रहर भूखा-प्यासा जागता रहा था, इसी कारण स्वत: व्रत हो जाने से शिवजी ने उसे सद्गति दी।

फल
‘स्कन्दपुराण’ में कहा गया है, ‘हे देवी, मेरा जो भक्त शिवरात्रि में उपवास करता है, उसे क्षय न होने वाला दिव्य गण बनाता हूं। वह सब महाभोगों को भोगकर अंत में मोक्ष पाता है।’

‘ईशान संहिता’ के अनुसार, यह व्रत सब पापों का शमन करने वाला है। यह 12 से 24 वर्ष के पापों का नाश करता है। यह मनुष्यों को भक्ति-मुक्ति देने वाला है। जो मनुष्य शिवरात्रि पर अखंडित व्रत करता है, उसकी सारी इच्छाएं पूर्ण होती हैं तथा वह शिव के साथ आनंद करता है। जो पुरुष व्रत से हीन होकर भी किसी विशेष उद्देश्य से शिवरात्रि में जागरण करता है, वह रुद्र के बराबर होता है।

सम्पूर्ण शास्त्रों में शिवरात्रि व्रत को सबसे उत्तम बताया गया है। कहा गया है कि यह व्रत परम मंगलमय और दिव्यतापूर्ण है। इससे सदा सर्वदा भोग और मोक्ष की प्राप्ति होती है। शास्त्रों में यह व्रत ‘व्रतराज’ के नाम से विख्यात है और चारों पुरुषार्थों को देने वाला है। संभव हो, तो उक्त व्रत को जीवन पर्यंत करें, अन्यथा 14 वर्ष के बाद पूर्ण विधि-विधान के साथ इसका उद्यापन कर दें।

यह व्रत प्राप्त काल से चतुर्दशी तिथि रहते रात्रि पर्यन्त करना चाहिए। रात्रि के चारों प्रहरों में भगवान शंकर की पूजा-अर्चना करने से जागरण, पूजा और उपवास तीनों पुण्य कर्मों का एक साथ पालन हो जाता है और भगवान शिव की विशेष अनुकम्पा और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।


Vikas Sharma
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5 से होगा भागवत कथा का आयोजन

Posted on 05 February 2010 by admin

चित्रकूट - शिवरामपुर स्थित प्रसिद्ध हनुमान मन्दिर लाइना बाबा में आगामी 5 फरवरी से श्रीमद् भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ का आयोजन किया जाएगा। जिसमें आचार्य ज्ञानेन्द्र जी महाराज कथा व्यास के रूप में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का रसपान श्रोताओं को करवाएंगे। यह आयोजन यहां चल रहे 14 वर्षीय सीता राम नाम अखण्ड कीर्तन के पांचवे वर्ष पर आयोजित वर्षीकोत्सव के अवसर पर किया जाएगा।

कथा समय दोपहर 12 बजे से सायं 4 बजे तक रखा गया है। आयोजन समिति के लोगों ने श्रद्धालुओं से अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित हो भगवान की लीलाओं का आनन्द उठाने की अपील की है। भागवत कथा के बाद विशाल भण्डारे का भी आयोजन किया जाएगा।

श्री गोपाल 09839075109

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पर्व काल शुरु होते ही जनसैलाब उमड़ा

Posted on 15 January 2010 by admin

चित्रकूट- मकर संक्रांति के पावन पर्व पर भोर से ही मंदाकिनी के विभिन्न घाट हर-हर गंगे के जयघोष से गूंज उठे। हर ओर जनसैलाब दिख रहा था। सर्वाधिक भीड़ राम घाट व राघव प्रयाग घाट पर उमड़ी। भरतकूप, मडफा पहाड़, वाल्मीकि आश्रम, साईपुर आदि स्थानों पर भी मेले लगे। मेलों में लोगों ने जमकर खरीदारी करने के साथ ही खानेपीने की चीजों का लुफ्त उठाया।

मुख्यालय के पुल घाट पर पर्व पर नहाने वालों का तांता सुबह से ही लगा रहा। गन्ना, मिट्टी के खिलौने व प्लास्टिक के समान की बिक्री जमकर हुई।

आसपास और दूरदराज के श्रद्धालुओं की टोलियों ने प्रात: काल से ही मंदाकिनी के घाटों पर डेरा जमा लिया था। दोपहर साढ़े बारह बजे के बाद पर्व काल शुरु होते ही जनसैलाब उमड़ने लगा। नहाने के बाद लोगों ने तिल के बने खाद्यान्नों के साथ ही खिचड़ी का दान भी किया। भरतकूप, मडफा, साईपुर और बाल्मीकि आश्रम में जोर दार मेला लगा। यहां पर ग्रामीणों की भीड़ अच्छी तादाद में रही। तीर्थ क्षेत्र में लोगों ने मंदाकिनी में स्नान के बाद स्वामी मत्स्यगयेन्द्र नाथ महाराज का जलाभिषेक करने के साथ ही स्वामी कामतानाथ के दर्शन कर कामदगिरि की परिक्रमा भी लगाई। भीषण ठंड के बाद भी बच्चों के लिये दिन काफी अच्छा बीता। जहां एक ओर दिन भर उन्होंने जमकर पतंगबाजी की वहीं तिल के लड्डू के साथ ही खिचड़ी का आनंद उठाया।

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मकर संक्रान्ति पर पवित्र सरोवरों में डुबकी लगाई

Posted on 15 January 2010 by admin

ललितपुर- मकर संक्रान्ति पर्व जिले में अगाध श्रद्धा के साथ मनाया गया। संक्रान्ति के मौके पर तीर्थ क्षेत्र श्री सीतापाठ मंदिर, पाली के नील कण्ठेश्वर मंदिर, अमझरा घाटी व रणछोर मंदिर में परम्परागत मेले लगे। लाखों श्रद्धालुओं ने स्नान कर भगवान भास्कर की विशेष पूजा अर्चना की। परम्परागत मेलों में भारी जनसैलाव उमड़ा रहा। सुरक्षा की दृष्टि से आयोजन में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई थी। विभिन्न संगठनों ने भी मकर संक्रांति पर्व को समरसता महोत्सव के रूप में मनाया तथा सामाजिक समरसता बढ़ाने के लिए खिचड़ी वितरित की गई।

मकर संक्रान्ति पर आज भगवान भास्कर का उदय 1 बजे के पश्चात ही हुआ। इस वजह से जनजीवन अस्त व्यस्त बना रहा। हालाकि पवित्र स्नान की समयावधि ब्रह्म मुहूर्त से लेकर सायं तक थी। इस कारण श्रद्धालुओं ने अपनी सुविधा के अनुसार पवित्र सरोवरों, नदियों में डुबकी लगाकर परम्परा को निभाया। उल्लेखनीय है कि सनातन धर्मी मकर संक्रान्ति पर्व को अगाध श्रद्धा व उत्साह के साथ मनाते है। आज से भगवान सूर्य की गति दक्षिणायण से उत्तरायण हो जाती है और प्रकृति के इस परिवर्तन को लोक कल्याण के अनुरूप माना जाता है। इसीलिए सनातन धर्मी पवित्र स्नान एवं भगवान भास्कर की विशेष पूजा अर्चना करते है। आंचलिक परम्पराओं में इस पर्व के दिन तिल व खिचड़ी का दान महत्वपूर्ण माना गया है। इस अधिमान्यता के अनुसार लोगों ने विभिन्न देवालयों में जाकर खिचड़ी एवं तिल का दान किया तथा सुख शांति की मनौतियां मांगी। इस पर्व के अवसर पर सनातनधर्मियों ने अपने घरों में धार्मिक अनुष्ठान किए।

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मकर संक्रांति: 1033 साल बाद आयेगा ऐसा योग…

Posted on 11 January 2010 by admin

मकर संक्रांति, मौनी अमावस्या और कंकण सूर्य ग्रहण इस बार एक ही दिन पड़ रहे हैं। मकर संक्रांति पर्व 14 जनवरी से प्रारंभ होकर 15 जनवरी सुबह 5 बजे तक है। वहीं 14 जनवरी को सुबह 10:11 बजे से मौनी अमावस्या शुरू हो जाएगी, जो 15 जनवरी को दोपहर 12.41 बजे तक रहेगी। तीनों पर्व का योग करीब एक हजार साल बाद बन रहा है। 15 जनवरी को कंकण संक्रांति भी है। इन तीनों का योग और कंकण सूर्य ग्रहण शुक्रवार को पड़ने तथा अन्य ग्रह के वक्री चलने से एक माह के भीतर तेज हवा के साथ वर्षा और ओले गिरने की संभावना है। 15 जनवरी को तीनों का यह दुर्लभ योग एक हजार साल बाद बन रहा है। इसके बाद अगला योग 1033 साल बाद यानी 24 दिसंबर 3043 को पड़ेगा। पितृदोष शांति तथा तंत्र, मंत्र की सिद्धि के लिए भी यह दिन अति महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। आमतौर पर मकर संक्रांति तथा मौनी अमावस्या में लगभग एक पखवारे का अंतर होता रहा है, लेकिन इस बार दोनों का योग साथ-साथ है। यह योग 20 साल बाद आया है पिछला योग 14 जनवरी 1990 को था। अब दोनों का अगला योग 14 जनवरी 2028 को बनेगा। संयोग से इसी दिन कंकण सूर्य ग्रहण भी पड़ रहा है। ये तीनों एक हजार साल बाद एक ही दिन पड़ रहे हैं। खगोल शास्त्रियों के लिए यह दिन काफी महत्वपूर्ण रहता है, इस दिन तीनों के योग से वातावरण पर असर डालने वाले तत्वों पर वे शोध करते हैं। ज्योतिषाचार्य विजय भूषण वेदार्थी ने बताया कि कंकण सूर्य ग्रहण के लिए ग्वालियर-चंबल संभाग में सूतक 14 जनवरी की रात्रि 11 बजे लग जाएगा। ग्वालियर में सूर्य ग्रहण का स्पर्श 15 जनवरी की सुबह 11:50 बजे और मोक्ष दोपहर 3:14 बजे होगा। परम ग्रास 59 प्रतिशत होगा। यह ग्रहण उत्तराषाढ़ नक्षत्र एवं मकर राशि में घटित होने के कारण इस नक्षत्र एवं मकर राशि वाले व्यक्तियों को विशेष कष्टकारक रहेगा।

ज्योतिर्विद का कहना है कि यूं तो हर माह सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है और इस प्रवेश के समय को संक्रमण काल कहते हैं। इसी से संक्रांति शब्द बना है। कर्क, तुला और मकर तीन बड़ी संक्रांति होती है जिसमें मकर संक्रांति सबसे महत्वपूर्ण है। इस बार 14 जनवरी को सूर्य दोपहर 12:36 बजे मकर राशि में संक्रमण कर रहा है। निर्णय सिंधु में कहा गया है कि यदि दिन में सूर्य मकर राशि में प्रवेश करे तो पूरा दिन और 16 घंटे तक मकर संक्रांति का पर्व काल रहता है।

ज्योतिर्विद का कहना है कि 22 जुलाई 2009 को सदी का सबसे बड़ा पूर्ण सूर्य ग्रहण था। इसके सात माह बाद ही 15 जनवरी को इसी सदी का सबसे बड़ा कंकण सूर्य ग्रहण होने जा रहा है। इसके बाद इतना लंबा कंकण सूर्य ग्रहण 1033 वर्ष बाद यानी 24 दिसंबर 3043 को दिखाई देगा।

Vikas Sharma
bundelkhandlive.com
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