कुदरत  का  कहर  क़यामत  के  आने   की  दस्तक  है  पानी  ही  पानी. इस से भी ख़राब हालात होंगे २०१२ में   ये परिणाम है  कुदरत से खिलबाड़ का........ “Plant Trees to Save Environment” , *खाकी वर्दी वालो के कारनामे-जनता की जुवानी * सफेद कुर्ते वाले नेताओ के कारनामे-जनता की जुवानी "bundelkhandlive.com" पर, आप के पास है कोई जानकारी तो आप भी बन सकते है सिटी रिपोर्टर हमें मेल करे editor@upnewslive.com पर या 09415060119 फ़ोन करे , SPC मीडिया ग्रुप पेश करते है <UPNEWS>मोबाईल sms न्यूज़ एलर्ट के लिए अगर आप भी कहते है अपने और प्रदेश की खबरे अपने मोबाईल पर तो अपना <नाम-, पता-, अपना जॉब,- शहर का नाम, - टाइप कर 09415060119 पर sms, प्रदेश का पहला हिन्दी न्यूज़ पोर्टल जिसमे अपने प्रदेश की खबरें सरकार की योजनाएँ,प्रगति,मंत्रियो के काम की प्रगति www.upnewslive.com पर

Archive | साहित्य

पाषाण शिला कहती पुकार,अब जाग उठो भारतवासी-कवि रमाशंकर मिश्र

Posted on 03 February 2010 by admin

भारत की अध्यात्मिकता,संस्कृति-मस्तक की बिन्दी।   वह व्यथा-कथा की अथ-इति,श्रद्धा स्वराष्ट्र की हिन्दी।।

कवि रमाशंकर मिश्र का जीवन परिचय11

पिता  -      स्व0 श्री रामक्रष्ण मिश्र आयुर्वेदाचार्य

माता -      स्व0 श्रीमती सुन्दर देवी मिश्रा

पत्नी   -      श्रीमती शैलकुमारी मिश्रा

जन्मतिथि  -      07-09-1937   जन्मस्थान  -      दारागंज, प्रयाग इलाहाबाद

पिता का जन्मस्थान        -     ग्राम समगरा, मर्का, बांदा, उ0 प्र0

पिता का निवास स्थान  -    कतिपय वर्ष दारागंज, प्रयाग और  तत्पाश्चात् कर्वी चित्रकूट, उ0 प्र0

शिक्षा -   1-एम0ए0 अंग्रेजी इलाहाबाद विश्वविद्यालय  2-एम0 ए0 हिन्दी आगरा विश्वविद्यालय               3-साहित्यरत्न,हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग,  इलाहाबाद  4-एल0टी0,के0पी0 टेनिंग कालेज इलाहाबाद

सेवा स्थल - अंग्रेजी प्रवक्ता और प्रधानाचार्य के रूप में श्री जे0पी0 र्मा इण्टर कालेज, बबेरू, बांदा, उ0प्र0

प्रकाशित रचनायें

अ-  महाकाव्य 1-  स्वामी विवेकानन्द  2- भीष्म पितामह 3-लवकुश  4- साध्वी द्रौपदी  5- महासती अनसूया                       6-  महानारी मदालसा 7- भगिनी निवेदिता 8- धर्मराज युधिष्ठिर 9-भक्त प्रवर सम्राट ध्रुव                        10-विप्रवीर परशुराम 11- भक्त सम्राट प्रहलाद

ब- खण्डकाव्य 1-  सुलोचना का सतीत्व 2- महादेवी राज्यश्री 3- डा0 ऐनी बेसेण्ट  4- राजर्षि मांधाता 5-  इन्द्राणी

स-  कविता-संग्रह 1- अन्तर्यात्रा 2-  सरस स्वर 3-  नयी कवितायें  4-  प्रयोगवादी आयाम 5-  विविध भाव तरंगें
6-  नवीन भावगीत 7-  ज्ञानगीत तरंग

विशेष 1-  14 रचनाओं पर शोधप्रबंध लिखकर एक शोध छात्र ने सागर विश्वविद्यालय म0 प्र0 से
पी-एच0 डी0 की उपाधि प्राप्त किया है।

2-  एक छात्र ने दो महाकाव्यों पर शोध अधिनिबंध लिखकर उज्जैन विश्वविद्यालय
से एम0 फिल0 प्राप्त किया है।

सम्मान 1-   विशिष्ट सम्मान पत्र सन् 1985 में 2- विशिष्ठ सम्मान पत्र सन् 1991 3- काव्यश्री सन् 1996 में
4-   निराला सम्मान पत्र सन् 2004 में5-  साहित्य विभूषण सम्मान सन् 2006 में
6-    समर्पण सम्मान सन् 2007 में

महाकाव्यों से उदाहरण

(1)    सागर मंजूषा दीपशिखा
साधना तपस्या की प्यासी।
पाषाण शिला कहती पुकार,
अब जाग उठो भारतवासी।।  (स्वामी विवेकानन्द महाकाव्य सर्ग 8 पृ0 106)

(2)    भारत की अध्यात्मिकता,
संस्कृति-मस्तक की बिन्दी।
वह व्यथा-कथा की अथ-इति,
श्रद्धा स्वराष्ट्र की हिन्दी।।       (साध्वी द्रौपदी महाकाव्य सर्ग 11 पृ0 282)

(3)    मधुऋतु आश्रम में आ उतरी,
अनसूया महासती के संग।
मधुकर कलिका की वार्तायें,
चढता जीवन में प्रणय-रंग।।   (महासती अनसूया सर्ग तृतीय पृ0 54)

(4)    पैदा हो आयरलैण्ड-मध्य,
भारत को मातृभूमि माना।
आध्यात्म जगत में कार्य किया,
भारतमाता को पहचाना।।   (भगिनी निवेदिता सर्ग अश्टम पृ0 109)

खण्डकाव्यों से उदाहरण

(1)    अपनी संस्कृति में नयी विभा,
आये, असुरत्व हटे प्रचण्ड।
मानवता के नव सुमन खिलें,
राक्षसी वृत्ति हो खण्ड-खण्ड।।   (सुलोचना का सतीत्व सर्ग चतुर्थ पृ0 62)

(2)    चन्द्रमा चांदनी से भरता,
पावन प्रयाग का तीर्थराज।
मानों फैला राज्यश्री-यश,
अरु हर्ष-कीर्ति धवलित समाज।।  (महादेवी राज्यश्री सर्ग पंचम पृ0 81)

कविवत संग्रहों से उदाहरण

(1)    जब तक नभ में रवि, शशि , तारक,
भूपर गंग-यमुन में पानी।
गर्जितोर्मि सागर के जल में,
तब तक तेरी अमर कहानी।।  (अन्तर्यात्रा की कविता क्रातिवीर चन्द्रशेषर आजाद पृ0 120)

(2)    माता निर्मल गायत्री,
वात्सल्य सुरभि भरती है।
घर के उजडे उपवन को,
निर्मल पवित्र करती है।।       (सरस स्वर की कविता मां का महत्व पृ0 80)

कवि रमाशंकर मिश्र, निवास :साहित्य सदन, बबेरू बांदा मो0-  91-9451850833

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नववर्ष के उपलक्ष्य में साहित्यक गोष्ठी संपन्न

Posted on 04 January 2010 by admin

प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में लक्ष्मीप्रसाद गुप्त की अध्यक्षता में नववर्ष के उपलक्ष्य में साहित्यक गोष्ठी बबेरू में संपन्न हुयी। गोष्ठी का संचालन शिशुपाल ने किया।

नववर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित गोष्ठी में सरस्वती वंदना के पश्चात रमाशंकर मिश्र ने सुनाया कि ‘राष्ट्र ब्यौम में घिरो वर्ष नव,सुधा वृष्टि कर गरल हरो। अपनी मां की काया धूमिल, कल्पलता को धवल करो।’ लक्ष्मीप्रसाद गुप्त ने पढ़ा कि ‘नववर्ष नव कूज सर्वत्र आनंद, नूतन वर्ष उमंगो का, इंद्र धनुष के रंगों का, स्वेद सृजन ने मांगा है साथ कलेंडर टांगा है, दाग न हो अब दंगों का, मेला लगे तिरंगो का।’ राजेंद्र दीक्षित ने कहा कि ‘नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन, आगमन-गमन दोनो शुभ हों, संसार मनाये नव खुशियां।’ शिक्षक अमरनाथ ने गाया कि ‘नव वर्ष तुम्हारा अभिनंदन, अर्पित तुमको मेरा वंदन, इस वीर प्रसूत धरती पर न पाक बचे और न लंदन।’ मनोज मर्दन ने पढ़ा कि ‘बूढ़ा दरिया सिमट कर बहता जाता, झुके हुये कंधो से जल का बोझ उठाता।’ डा.रामकिशोर विद्यार्थी ने पढ़ा कि ‘मन रे सम्मुख देख उजाल, अंधियारी जाने वाली है।’ शिक्षक नत्थीलाल ने कविता पाठ किया। शिशुपाल ने कविता के माध्यम से संदेश दिया। रामचंद्र सरस ने खजुराहो का वर्णन किया कि ‘मै तलाशता रह उकेरने वाले हाथों के नाम, वे नहीं मिले, सोंचता रहा आखिर क्यों नहीं होती ऐसे हाथों की पहचान, तब से आज तक।’ केशव प्रसाद मिश्र ने कहा कि ‘दो हजार दस क्या तुम भी वैसा करोगे, अनुज 2009 की राह पर चलोगे, करना चाहते हो तो कुछ ऐसा करो कि स्वर्णिम पल बन जाओ काल के।’ परमेश्वरी दयाल तिवारी ने सुनाया कि ‘आर्या वर्ष नवल लाया हर्ष नवरत्‍‌न, कैसा था अपना बीता हुआ कल, इसका करना है मंथन।’ के साथ आये हुये सभी प्रबुद्धजनों व कवियों का आयोजकों ने आभार जताया।

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महाराजा मर्दन सिंह का त्याग और बलिदान अविस्मरणीय

Posted on 04 October 2009 by admin

ललितपुर- झासी की रानी लक्ष्मीबाई के साथ सन 1857 की क्रान्ति में उनका साथ देने वाले बानपुर नरेश महाराजा मर्दन सिंह ने पूरे बुन्देलखण्ड में उस स्वतंत्रता आन्दोलन की अगुवाई कर पूरे देश में इस क्षेत्र का डका बजाया। उनके असीम त्याग और बलिदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है।

उक्त विचार स्थानीय विकासखण्ड सभागार में आयोजित महाराजा मर्दन सिंह की 207 वीं जयंती समारोह के मुख्य अतिथि केन्द्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने व्यक्त किये।

मुख्य अतिथि ने कहा कि इतिहास पुरुष महाराजा मर्दन सिंह सरीखे अनेकों स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदान से ही हमें स्वतंत्रता प्राप्त हुई है। उनके सम्मान में इस तरह के आयोजन करने से समाज में चेतना और जागृति पैदा होती है। कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि नगर पंचायत अध्यक्ष मुक्ता सोनी ने कहा कि महाराजा मर्दन सिंह की इतिहास गाथा के कारण तालबेहट का नाम बुन्देलखण्ड में ही नहीं अपितु पूरे देश में जाना जाता है। उन्होंने इस ऐतिहासिक नगरी को पर्यटन विकास के क्षेत्र से जोड़े जाने की माग की। नेहरू महाविद्यालय के इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. बिहारी लाल बबेले ने महाराजा मर्दन सिंह के विभिन्न संस्मरणों पर विस्तार से प्रकाश डाला और उन पर शोध कराये जाने की माग की। जिले के वरिष्ठ पत्रकार सुरेन्द्र नारायण शर्मा ने भी ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती देने वाले महाराजा मर्दन सिंह को एक वीर योद्धा व सच्चा सिपाही बताया।

सभा को रामेश्वर प्रसाद शुक्ला, पं. बाबूलाल द्विवेदी, किशोरी शरण लिटौरिया, रामसेवक देवलिया, शशिभूषण संज्ञा जीतू आदि ने सम्बोधित किया। इस मौके पर महाराजा मर्दन सिंह के वंशज प्रपौत्र कुंवर गोविन्द सिंह जूदेव व मर्दन सिंह के प्रमुख तोपची दलेल खा के वंशज रफीक खान व मर्दन सिंह के प्रधान सेनापति मिन्ने वाल्मीकि के वंशज हरीकृष्ण वाल्मीकि को सम्मान पत्र देकर सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में प्रदीप त्रिपाठी, रामराजा बुन्देला, पी.डी. बट्टा, मनोहरनायक, सुभाष जायसवाल, जसपाल बंटी, विजय किशोर सोनी आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छोटेलाल तिवारी व संचालन विनोद कुमार अवस्थी ने किया।

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मानव सेवा की नहीं तो सार नहीं जीने में

Posted on 28 September 2009 by admin

श्रीनगर- साहित्यकार कल्याण संस्था व श्री दुर्गा समिति के तत्वाधान में ऐतिहासिक श्रीनगर दुर्ग में कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न कवियों ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की।

नवरात्र पर्व पर आयोजित कवि सम्मेलन का आयोजन आचार्य श्रीराम सोनी ने वाणी वंदना प्रस्तुत कर किया। उन्होंने शहीदों पर कविता पढ़ते हुये कहा कि तेरा वक्ष छलनी करूंगी अपने ही हाथों पर निज दूध को न कभी भी लजाऊंगी। बैजनाथ वर्मा रसरंग ने राष्ट्रीय एकता पर बल देते हुये कहा कि चमन की बात करते है , हमारा देश मंदिर है, हमारा देश मस्जिद है, अमन के हम पुजारी है अमन की बात करते है। मनोज कुमार मधुर ने चाहे जाओ मथुरा काशी चाहे जाओ मदीने में, मानव सेवा किया नहीं तो सार नहीं है जीने में। पंक्तियां प्रस्तुत कर श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया। इस अवसर पर अनिल रावत, पं जगप्रसाद तिवारी, शिवनाथ त्रिपाठी शंख आदि ने भी अपनी रचनाओं ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बैजनाथ वर्मा रसरंग व संचालन शिवनाथ त्रिपाठी ने किया। कार्यक्रम में नवल किशोर सोनी को साल व श्रीफल देकर सम्मानित किया गया।

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क्लिष्टता के आवरण से मुक्त करे हिंदी को

Posted on 15 September 2009 by admin

उरई-दयानंद वैदिक महाविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग में सोमवार को हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में ‘राष्ट्रभाषा हिंदी दशा और दिशा’ विषय पर संगोष्ठी हुयी जिसकी अध्यक्षता डा. अरुण कुमार प्रवक्ता शिक्षा विभाग ने की।

संगोष्ठी के अवंसर पर राजनीति विज्ञान विभाग के प्रवक्ता डा. आदित्य कुमार ने हिंदी को ग्राह्यं बनाने के लिए उसे क्लिष्टता के आवरण से मुक्त कराने और जन साधारण की सहज भाषा के रूप में विकसित करने का सुझाव दिया। डा. वीरेद्र यादव ने कहा कि भूमंडलीकरण के दौर में हिंदी विश्व बाजार की भाषा के रूप में स्थान बना चुकी है। यदि इस समय दृढ़ संकल्पित होकर हिंदी को राजभाषा का अधिकार दिलाने का काम किया जाये तो आसानी से हो सकता है। डा. नगमा खान ने हिंदी को व्यवहारिक भाषा बनाने का सुझाव दिया। डा. आरएन मानव ने कहा कि हिंदी की बात नेता और बुद्धिजीवी सभी करते है लेकिन जब तक वे स्वयं और अपने बच्चों में हिंदी के प्रति अनुराग जागृत नहीं करेगे तब तक हिंदी की स्थिति नहीं सुधरेगी। डा. अनुज भदौरिया ने एकल काव्य पाठ किया। संचालन डा. राममुरारी चिरवारिया ने किया।

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हिन्दी पर भारी पड़ रही अंग्रेजियत

Posted on 14 September 2009 by admin

ललितपुर- आज फिर हिन्दी दिवस पर लम्बे चौड़े दावे किये जायेंगे, लेकिन अभी भी हिन्दी को भाषाई संक्रमण से मुक्त रहने की अत्यंत आवश्यकता महसूस की जा रही है। एक तरफ जहा सरकारी कार्यालयों में धड़ल्ले से हिन्दी पर अतिक्रमण चल रहा है, वहीं बोलचाल व अन्य कार्यो में भी अंग्रेजियत हावी हो रही है। विद्वानों ने हिन्दी पर हावी अंग्रेजियत को लेकर चिंता जताई।

हिन्दी दिवस की पूर्व सन्ध्या पर आयोजित कार्यक्रम में वक्ताओं ने कहा कि देश को जब आजादी मिली थी, तब पूरी तरह से अंग्रेजियत हावी थी। जल्दी अंग्रेजियत के संक्रमण से मुक्त हो पाना सम्भव नहीं था, लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। इस देश के विभिन्न स्तम्भों में हिन्दी की आवश्यकता महसूस की जा रही है। अभी भी कुछ स्तम्भ अंग्रेजी में लिपिबद्ध है। यह भी तथ्यपूर्ण है कि अंग्रेजी विश्व भाषा है। इसको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता लेकिन हिन्दी इस देश का गौरव है जिसका अस्तित्व पहले होना चाहिए। अंग्रेजी की बाध्यता न हो इस दिशा में मंथन किये जाने की आवश्यकता है। जिस तरह से देशी संस्कृति पर अंग्रेजी संस्कृति हावी हो रही है। इसी तरह का भाषा का भी यह हाल है। कम्पयूटर के अलावा अन्य आधुनिकतम संचार क्षेत्रों में न केवल हिन्दी वरन क्षेत्रीय भाषाओं के भी सॉफ्टवेयर निर्मित कर विभिन्न ग्रन्थों का अनुवाद होना चाहिए। इलैक्ट्रॉनिक युग में पुस्तकालय से आगे बढ़कर ज्ञान का भण्डार अब कम्प्यूटर तक सीमित हो गया है। कम्प्यूटर में भी हिन्दी का महत्व कम नहीं होना चाहिए। एक कम्प्यूटर पर सभी ग्रन्थ पढ़े जा सकें। इसके लिए भी अलग से ध्यान देने की जरूरत है। विश्व में आपूर्तित किये जाने वाले कम्प्यूटर इस देश में भी निर्मित होते है। नये दृष्टिकोण के अनुसार सृजन करना कठिन कार्य नहीं है।

वक्ताओं ने कहा कि संस्कृत में संस्कार निहित है। यह संस्कार हिन्दी के द्वारा ही आगे बढ़ रहे थे, लेकिन अंग्रेजी शब्दों ने भी हिन्दी में घुसपैठ कर उनका मूल माधुर्य दरकाने का कार्य किया है। प्रणाम के स्थान पर हाय हेलो ने स्थान ले लिया है। इसी तरह आम दिनचर्या में भी अंग्रेजियत हावी हो गयी है। यह केवल बोलचाल की भाषा तक ही सीमित नहीं है। वरन, लेखन कार्य में भी इस मिश्रित भाषा का प्रयोग बढ़ रहा है जो हिन्दी के लिए चिंता जनक है। जैन दर्शनाचार्य सुनील जैन बताते है कि असलियत में हिन्दी भाषा और बोली के तौर पर दम तोड़ रही है। विदेशों में भी और अपनी जमीन पर भी जहा जिन्दा है वहा मजबूरी और बदले स्वरूप में। हिन्दी साहित्य के मठाधीशों ने भी इसकी अवनति करने में योगदान देने का कार्य किया है। आज दुनिया भर में बोली जाने वाली भाषाओं में हिन्दी तीसरे नम्बर पर है, लेकिन हिन्दी बोलने वाले व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाता है, अंग्रेजी का दबदबा आज भी ज्यादा है। कुछ दिनों पूर्व शिक्षा मंत्री ने भी कहा था कि छात्रों पर जबरदस्ती हिन्दी थोपी नहीं जानी चाहिए। गाधी जी ने भी भारतीय स्कूलों में अंग्रेजी में शिक्षा देने के खिलाफ आवाज उठायी थी। हिन्दी को खतरा बाहर से कम भीतर से ज्यादा है। हिन्दी के सिवा इस देश का अस्तित्व कुछ नहीं हो सकता है लेकिन फिर भी दक्षिणी भाषाविद हिन्दी का विरोध करते रहते है। यही वजह है कि पूरी तौर से हिन्दी इस देश के सभी कार्यो में प्रमुख स्थान हासिल नहीं कर पा रही है। हिन्दी दिवस पर कम से कम हिन्दी को अधिकार मिलना चाहिए। केवल निबन्ध भाषण प्रतियोगिता आयोजित करने से हिन्दी का भला नहीं होगा वरन हिन्दी को कमजोर बनाने वाले तत्वों पर आघात करना होगा तभी हिन्दी न केवल इस देश में वरन विदेशों में भी सम्मान पा सकेगी। पड़ौसी देश नेपाल पूरा नहीं तो आधा भारत पर निर्भर है। इसके बावजूद हिन्दी के प्रति नफरत इतनी है कि नेपाल के उप राष्ट्रपति परमानन्द झा द्वारा हिन्दी में शपथ लेने के विरोध में कार्य पालिका से लेकर न्याय पालिका तक उतर आयी। नेपाल में हार कर भी जीती है हिन्दी, लेकिन इस देश में भी हिन्दी को जिताने का कार्य करना होगा।

पूर्व माध्यमिक विद्यालय मिर्चवारा में शिक्षकों की एक बैठक में राष्ट्रभाषा हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का प्रतीक बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि संसार की कोई भी भाषा ऐसी नहीं है जो हिन्दी के समाज सरल व अभिव्यक्त की जाने वाली हो। इस देश के नागरिकों का दायित्व बनता है कि वह हिन्दी का सम्मान करे। हिन्दी का असम्मान करके वह किसी भी देश में सम्मान नहीं पा सकते। महात्मा गाधी ने भी कहा था कि इस देश के बच्चे विदेशी भाषा का बोझ अपने सिर पर न ढोयें और न ही उगती हुई शक्ति का हृास करे।

इस मौके पर एनपीआरसी पंचम लाल, दीपक रजक, गोकुल प्रसाद, अमित श्रीवास्तव, अमित चौधरी, आलोक याज्ञिक, लाल बहादुर आदि उपस्थित थे। अध्यक्षता अरुण गोस्वामी व संचालन मनोज सक्सेना ने किया।

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फूलों का बाड़ा पर सम्मानित हुए आरिफ

Posted on 14 September 2009 by admin

बांदा- शबरी की ओर से तृतीय प्रेमचंद्र स्मृति सम्मान कथाकार मो.आरिफ को मिला।उनका चर्चित कहानी संग्रह ‘फूलों का बाड़ा’ की भूरि-भूरि सराहना भी हुई।

शबरी द्वारा आयोजित सम्मान समारोह के दौरान स्थानीय कवियों और बाहर से आये समालोचकों का जमावड़ा लगा। इस मौके पर प्रख्यात समालोचक प्रो. नामवर सिंह ने कवि केदार के कृतित्व व व्यक्तित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि वह सिर्फ सौंदर्य के कवि नहीं अपितु क्रांति के भी कवि हैं। उनकी प्रकृति संबंधी कविताओं के साथ राजनीतिक अर्थो वाली कवितायें भी महत्वपूर्ण हैं। समारोह की अध्यक्षता कवि आलोचक प्रो. राजेंद्र कुमार ने की। उन्होंने कवि केदार को भारत की श्रमशील जनता का प्रतिनिधि कवि बताया। कार्यक्रम की शुरूआत में प्रो. नामवर सिंह द्वारा शबरी की ओर से तृतीय प्रेमचंद्र स्मृति सम्मान चर्चित कलाकार मो. आरिफ के उनके कहानी संग्रह ‘फूलों का बाड़ा’ के लिए प्रदान किया। सम्मान के तौर पर उन्हें 11 हजार रूपये की राशि, सम्मान पत्र व अंगवस्त्र भेंट किया गया। इस अवसर पर ‘किसान समय व वर्तमान कथा साहित्य’ विषय पर संगोष्ठी भी हुयी। जिसमें विवेक निराला, प्रदीप सक्सेना, रमेश कुमार, प्रेम सिंह, अवधेश मिश्र, अखिलेश व रवींद्र वर्मा ने अपने विचार व्यक्त किये।

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हड़बड़ी में रहने वाले साहित्य से दूर रहें

Posted on 14 August 2009 by admin

सागर- वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी ने डा. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय की पहली व्याख्यानमाला में अपने नाम और शोहरत के अनुरूप व्याख्यान देकर यह साबित किया कि उन्हें हिंदी साहित्य में आलोचक क्यों कहा जाता है। वाजपेयी ने साहित्य क्यों विषय पर दो टूक शब्दों में कहा कि हड़बड़ी में रहने वाले साहित्य से दूर रहें तो बेहतर है। यह हिंसा का समय है। ऐसे में साहित्यकार अपना धर्म न छोड़ें। सभी धर्म हिंसक हो गए हैं। यह दुनिया घायल लोगों का महाद्वीप बन गई है।

वाजपेयी ने कहा कि ऐसा हिंसक समय पहले कभी नहीं देखा। सौ से ज्यादा क्षेत्र सिविल हिंसा की चपेट में है। हर तरफ हिंसा है। समाज घट रहा है और बाजार बढ़ रहा है। मध्यम वर्ग के घर गोदाम बनते जा रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि दुनिया विचारों से बदलती है, लेकिन अब यह दुनिया सामान से बदल रही है। सब घरों की गंध एक जैसी हो गई है। लोग एक जैसा भोजन कर रहे हैं और चैनल भी एक ही देख रहे हैं। समय ने धर्मो में घृणा फैला दी है। ऐसा धर्म किस काम का जो हमारे लोगों को अस्पृश्य करार दे।

श्री वाजपेयी ने कहा कि सौ साल पहले महात्मा गांधी ने चेतावनी दी थी कि यह पश्चिम हमारे देश को बाजार में बदल रहा है। वह चेतावनी आज सच साबित हो रही है। नरेंद्र मोदी डंके की चोट पर चुनाव जीते। झूठ का सहारा लेकर इराक पर हमला किया गया। यह हमारे झूठ की विजय का समय है। लोकतंत्र में भी विकृतियां आ गई हैं।

गोपालगंज जाने में घबराता हूं- अशोक वाजपेयी गोपालगंज में रहते थे। यहीं पढ़े और आगे बढ़े। उन्होंने कहा कि जब सागर आता हूं तो गोपालगंज जाने में घबराता हूं। गोपालगंज दुकानों में तब्दील हो गया है। दुनिया चलना भूल गई है। स्थानीयता गायब हो गई है। सागर की भी गायब हो गई होगी। हम अकेले रहने से घबराते हैं। हम टुच्च सपना देखते हैं। हम फ्रीज, कूलर, फर्नीचर और सामान का सपना देखते हैं। यदि हमारे पास हुनर, हिम्मत और हौसला है तो विकल्प संभव है। न्याय, स्वतंत्रता और सामाजिकता का सपना संकट में है।

साहित्य अपनी सत्ता स्थापित नहीं करता- अशोक वाजपेयी ने साहित्य की जरूरत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य दूसरा जीवन जीने की सुविधा प्रदान करता है। साहित्य भौतिक सीमाओं से मुक्त कराता है। वह अधूरा सच प्रस्तावित करता है। साहित्य कभी अपनी सत्ता स्थापित नहीं करता। साहित्य ऐसी संसद है जिसमें आप प्रवेश पा गए तो अपदस्थ नहीं किए जा सकते। साहित्य का देवता ब्यौरों में बसता है। वर्तमान समय में तीन नायक पैदा हो गए हैं। नेता, अभिनेता और खिलाड़ी। इन्हें खल त्रिमूर्ति कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उन्होंने कहा हमारे और दूसरों के बीच की दूरी साहित्य ही ध्वस्त करता है। साहित्य के सारे सच मटमैले होते हैं। साहित्य निरंतरता का आकाश पैदा करता है।

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बलिदान व्यर्थ नही गया

Posted on 19 June 2009 by admin

झाँसी १८५७ के संग्राम का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिंसा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झाँसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया। इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस संग्राम में सहयोग दिया।

१८५७ के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झाँसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया। १८५८ के जनवरी माह में अँग्रेजो की सेना ने झाँसी की ओर बढना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ़्तों की लडाई के बाद अँग्रेज़ी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गयी। रानी झाँसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या तोपे से मिली।रानी कालपी पहुची, वहां का भी बुरा हाल था। रावसाहब, जिनके हाथ मे सेना का भार था, चैन की बंसी बजाने मे मस्त थें। नतीजा यह हुआ कि उन्हे जल्दी ही कालपी से बोरिया-बिस्तर बांधने के लिए मजबूर होना पडा। रानी ने सलाह दी कि उन्हे ग्वलियर के किले पर अधिकार कर लेना चाहिए। वहां से जमकर लड़ाई की जा सकती थी। किसी का ध्यान इस ओर नही गया थां। सबने रानी की सूझबूझ की दाद दी। सेना के एक हिस्से का संचालन स्वयं रानी ने लिया और ग्वालियर का किला रावसाहब के हाथ् मे आ गया। जीत हो जाने पर रावसाहब पंत प्रधान पेशवा बने।रावसाहब को अब भी चेत नही हुआं। राज्य पाते ही सोई हुई लालसांएं फिर से जाग उठी। नाच-रंग आदि मे समय बीतने लगा। राज्य मे अव्यवस्था फैल गई और अंग्रेजों की फौज ने आकर ग्वालियर के किले को घेर लिया। अब सब लोग घबराये, रानी जान गई कि यह आखिरी लड़ाई है। फिर भी उन्होने हिम्मत बंधाई। कहाकि बहादुरी से लड़ो तो अब भी हारी बाजी जीत सकते हो। एक बार फिर बहादुर कमर कसकर तैयार हो गये, मगर इस बार ग्वालियर के सरदरो ने ही धोखा दियां।
महाबलिदान की घड़ी आ गई। रानी ने अपने बचे-खुचे सरदारों को इकटठा किया और उनसे कहा कि अब मै आखिरी दांव लगाने जा रही हूं। याद रखना—मेरी लाश को फिरंगी हाथ न लगाने पावें। दामोदरराव को उन्होने अपने ,भरोसे के एक सरदार के हाथो सौप दिया।
दूर पर अंग्रेजी सेना का बिगुल उठा। रानी का अपना घोड़ा मर चुका था। उन्होने दूसरा घोड़ामांगा। सरादारों ने एक ऊंचा घोड़ा लाकर दे दिया। रानी उसपर सवार होकर चली। थोड़ी ही दूर जाने पर उन्हे मालूम हो गया कि घोड़ा अड़ियल है। एक नाले पर घोड़ा अड़ गया। रानी को अग्रेजों ने घेर लिया। एक निशाना उनकी आंख मे लगा। दूसरी चोट ने उनके प्राण हर लिये। तबतक सरादार आ पहुंचे। गोरे जान बचाकर भाग निकले।
सरदारों ने रानी को घोड़े पर से उतारा और चिता जलाकर उनकी दाह-क्रिया कर दी। रानी का सपना उस समय पूरा न होसका, लेकिन उनका बलिदान व्यर्थ नही गया। वह स्वराज्य के महल की नीवं का पत्थर बनीं।

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खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

Posted on 18 June 2009 by admin

झांसी -देश के पहले स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली रानी लक्ष्मीबाई के अप्रतिम शौर्य से चकित अंग्रेजों ने भी उनकी प्रशंसा की थी और वह अपनी वीरता के किस्सों को लेकर किंवदंती बन चुकी है।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का मूल नाम मणिकर्णिका था और लोग उन्हें मनु कह कर बुलाते थे। 19 नवंबर 1835 को वाराणसी में पैदा हुई मनु बहुत दिन तक इस दुनिया में नहीं रह सकी, लेकिन इस कम समय में ही उन्होंने अपनी वीरता का ऐसा प्रदर्शन किया कि वह युगों-युगों तक अमर हो गई।

पहले स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख हस्तियों में से एक लक्ष्मीबाई की जन्मस्थली पर एक स्मारक बनाने की बात चल रही है और प्रदेश सरकार की योजना उनकी याद में एक स्मारक बनाने की है।

मनु जब मात्र चार साल की थीं, तब उनकी मां का निधन हो गया। पत्नी के निधन के बाद मोरोपंत मनु को लेकर झांसी चले गए। मनु ने बचपन में शास्त्रों के अलावा शस्त्रों की भी शिक्षा हासिल की थी। कम उम्र में ही उनकी शादी झांसी के राजा गंगाधर राव से हो गई। उनकी शादी के बाद झांसी की आर्थिक स्थिति में अप्रत्याशित सुधार हुआ। इसके बाद मनु का नाम लक्ष्मीबाई रखा गया।

लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने बाद ही उसकी मौत हो गई। इसके बाद राजा का स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा। उन्होंने दामोदर राव को गोद ले लिया। लेकिन राजा ज्यादा दिन जीवित नहीं रह सके और जल्दी ही उनकी मृत्यु हो गई।

युवा रानी पर एक के बाद एक मुसीबतें आ रही थीं। पहले पुत्र फिर पति की मृत्यु। मुसीबतें खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं। अंग्रेजों ने दत्तक पुत्र को झांसी का उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया। डलहौजी की राज्य हड़प नीति के तहत ब्रिटिश शासन ने झांसी को अपने राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया।

लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों की शर्ते मानने से इनकार कर दिया और अंग्रेजों से युद्ध का फैसला कर लिया। अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध में उन्होंने अप्रतिम वीरता का परिचय दिया, लेकिन वह 18 जून 1858 को वीरगति को प्राप्त हुई।

1857 के संग्राम में झांसी एक प्रमुख केंद्र के रूप में उभरा था। लक्ष्मीबाई ने कम उम्र में ही साबित कर दिया कि वह न सिर्फ बेहतरीन सेनापति हैं बल्कि कुशल प्रशासक भी है। वह महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने की भी पक्षधर थीं। उन्होंने अपनी सेना में महिलाओं की भर्ती की थी। लक्ष्मीबाई ने अपनी सुरक्षा में भी महिला सैनिकों को शामिल किया था।

कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की झांसी की रानी शीर्षक  वीर रस में लिखी गई इस लंबी कविता में उन्होंने लक्ष्मीबाई को खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कहा है। उल्लेखनीय है कि रचना के वर्षो बाद भी यह कविता काफी लोकप्रिय है।

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